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वह अनुपमा !

Posted On: 4 Jul, 2015 Others,Junction Forum,(1) में

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Niyati
ना ना अब बस भी करो
सब्र का हर बांध टूटा
नियति ऐसे चल पड़ी कि
बुन गया हर स्वप्न झूठा !

सरस उन दो नयनों में
शून्य ही अब दिखता है
आशाएं टूटी दरक कर
फिर वो टुकड़े चुनता है !

दुनिया के इतने रंग देखे
बेनूर कोहिनूर हो गया
संघर्ष पथ का वो पथिक
विश्राम अब तकने लगा !

हार का है बोझ सर पे
कदम अब उठते नहीं
राहें भी रुख मोड़ चली
आ चल आसमां ढूंढे कहीं !

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rajanidurgesh के द्वारा
July 5, 2015

 अत्यंत मर्मस्पर्शी कविता वाह! रजनीजी जवाब नहीं आपकी लेखनी की बधाई

rajanidurgesh के द्वारा
July 4, 2015

रजनीजी यथोचित बहुत सुन्दर ! सारगर्भित एवं हृदयभेदक.” हार का है बोझ सर पे कदम अब उठते नहीं”- अंदर तक झकझोर गया.


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