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सीमा तय करेंगे ये...?! Jagran Junction Forum

Posted On: 14 Jul, 2012 Others,मेट्रो लाइफ में

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जागरण जंक्शन फोरम में बेटियों के अपना या पराया होने के मुद्दे पर बहस छिड़ चुकी है और अधिकांश यही मानते हैं कि बेटियां अधिक संवेदनशील हैं लिहाजा वो ज्यादा अपनी हैं | मेरे मन में भी कुछ ऐसे सवाल उठने लगे जिसका उत्तर ढूंढे नहीं मिला ! हमारी मुलभुत सामाजिक संरचना , संस्कृति व संस्कारों में बेटियों की वास्तविक जगह एवं उसकी मर्यादा विवाह के बाद ही तय रखी गई है | विवाह से पूर्व उसे सुरक्षित व संरक्षित रखने कि जिम्मेवारी उसके माता पिता को सौंपी गई है |

युग बदला | अब बदलते ज़माने की मांग के हिसाब से बेटियों ने अपनी पुरातन छवि से छुटकारा पाने की ठान ली और इसके लिए कदम कदम पर बेटियां अपनी प्रतिभा साबित करती रही | आज उनके हौसले में पुरुषों से आगे निकलने की जिद साफ़ दिखती है | हर हाल में अपनी पहचान पाने की उनकी जद्दोजहद मंजिल पाने को बेताब दिखती है पर रास्ते की रुकावटें हैं जो कम होने का नाम ही नहीं लेती | यहाँ तक कि माता पिता के लिए उनके सुरक्षा की चिंता आज भी वैसी ही दिखती है जैसी युगों पूर्व थी ! और ये चिंता क्यों न हों, घर, बाहर, पड़ोस, स्कूल,कालेज.. यहाँ तक की राह चलते भी बेटियों की आबरू तार तार कर दी जाती है !

दो दिन पहले की गोहाटी की एक घटना अभी न्यूज चैनलों की टी आर पी बढा रहा है, पर उस स्कूली बच्ची की मनोदशा की हम कल्पना तक नहीं कर सकते जिसका मनचलों ने सरेआम चीरहरण कर डाला , वो भी सौ तमाशबीन के सामने ! उसकी गलती यह कि वह रात के नौ बजे एक बर्थडे पार्टी अटेंड कर निकली थी और बाहर निकलते ही ….और वह गिड़गिड़ाती रह गई आधे घंटे तक ! यह दृश्य रोंगटे खड़ा कर देनेवाला था !

कौन स नया युग,कौन सी आजादी और किसके बदले मानसिकताओं की बात हम करते हैं जब ऐसी घटनाएँ हमारे विश्वास कि धज्जियाँ सरेआम उड़ा जाती हैं | लगता है जैसे पुरुष सत्तात्मक समाज आज भी लड़कियों की आजादी और उनकी अलग पहचान को खुले दिल से स्वीकार नहीं कर पा रही ! और इधर आज भी बेटियों के अभिभावक यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर बेटियों के सुरक्षा की सीमा कहाँ तक निर्धारित करनी है !

दिल्ली में एक बयालीस वर्ष का शिक्षक अपने स्कूल की एक चौदह वर्षीय छात्रा का पिछले चार वर्षों से शारीरिक शोषण कर रहा था, डरी सहमी बच्ची के घरवालों को जिसकी भनक तक नहीं मिल पाई ! ..सवाल यही कि बेटियों का रात में निकलना असुरक्षित है तो दिन में भी वो कितनी सुरक्षित है ? वह घर से बाहर हर कहीं असुरक्षित है तो वह अपने घर, पड़ोस, स्कूल या कालेज में ही कितनी सुरक्षित है ?!

इन सवालों से परेशां मन में एक ख्याल यह भी आता है कि इस दुर्दशा के सामने माता पिता का सख्त अनुशासन लाख गुना बेहतर है ! अनुशासन की सीमाओं के अन्दर कम से कम बेटियों के वजूद और आत्म सम्मान की धज्जियाँ तो नहीं उडेंगी !

यानि घूम फिरकर वही पितृ सत्तात्मक सोच हर हाल में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है ..कल की ही एक खबर इस सोच का पुख्ता समर्थन करती है जिसमें यूपी के एक गाँव में यह तुगलकी फरमान जारी किया गया हैं कि चालीस वर्ष से कम की महिलाएं अपने पास मोबाइल फोन नहीं रख सकतीं !! ..और बेटियां हैं जो फिर से हार मानने को तैयार नहीं और वो हार मानें भी क्यों ?बड़ी मुश्किलें झेलकर उसने अपने लिए एक जगह बनाई है , कितनी ही परीक्षाओं के बाद उसने अपना परिचय ढूंढा है, जिसे वो आसानी से नहीं खो सकतीं !
आखिर में वही सनातनी सवाल पुनः सामने खड़ा हो गया कि क्या बेटियां परायी होती है ? …ऐसी घटनाएँ इस बात की पुरजोर वकालत करती हैं और माता पिता के मन में उस डर को और पुख्ता करती है कि उनकी बेटियां सही सलामत “अपने घर” चली जाएँ बस….और कुछ नहीं चाहिए !

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36 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Punita Jain के द्वारा
July 17, 2012

आदरणीय रजनी जी, आपका यह लेख आज के वातावरण में बेटियों के लिए माता -पिता की चिंता को बखूबी व्यक्त कर रहा है |आज जहाँ एक और बेटियां घर से बाहर निकल तेजी से सफलता की सीढियाँ चढ़ रही हैं , वहीं दूसरी ओर उनके साथ दुर्व्यवहार की घटनाएँ भी बढ़ती जा रही हैं |ऐसे में माता-पिता दुविधा में हो जाते है कि–वे क्या करे ?

    rajnithakur के द्वारा
    July 17, 2012

    पुनीत जी, माता पिता की दुविधा अपनी जगह सही है क्योंकि बात फिर वहीँ जाकर अटकती है कि बेटियों को प्रोत्साहित तो करना है पर उसकी सलामती की कीमत देकर नहीं..

yogi sarswat के द्वारा
July 16, 2012

बड़ी मुश्किलें झेलकर उसने अपने लिए एक जगह बनाई है , कितनी ही परीक्षाओं के बाद उसने अपना परिचय ढूंढा है, जिसे वो आसानी से नहीं खो सकतीं ! आखिर में वही सनातनी सवाल पुनः सामने खड़ा हो गया कि क्या बेटियां परायी होती है ?निश्चित रूप से बड़ी मुश्किलों से लड़कियों ने अपने लिए जो जगह बनाई है वो प्रशंशनीय है किन्तु इतनी जगह से काम नहीं चलने वाला , आदरणीय रजनी जी ! आपको और ज्यादा जगह बनानी होगी , समाज के फैसलों में अपने आप को शामिल करना होगा तभी कुछ द्रश्य बदलेगा और तभी सही इज्ज़त मिलेगी ! बहुत सटीक लेख !

    Chandan rai के द्वारा
    July 16, 2012

    मे मित्र योगी जी की बातो से सहमत हूँ !

    rajnithakur के द्वारा
    July 17, 2012

    बहुत खूब योगी जी..सही कहा इतनी जगह से काम चलनेवाला नहीं है,पर बात वही है कि खड़े होने की जगह बना ली है तो फिर बैठने की जगह भी बना ही लेंगे.. उत्साहजनक प्रतिक्रिया हेतु आभार

    rajnithakur के द्वारा
    July 17, 2012

    धन्यवाद चन्दन जी..

ANAND PRAVIN के द्वारा
July 16, 2012

आदरणीय रजनी जी, नमस्कार सबसे पहले एक विचारणीय मुद्दे को उठाने के लिए बधाई फिर मैं आपके लेख को पढने के बाद एक ही बात कहना चाहूँगा ………. आज वर्तमान परिस्तिथियों में पहले वाली बात नहीं रही की आप यह कह सकें की लड़कियों ने पुरुष से आगे निकलने की ठान ली है या वो ऐसा कुछ सोचती भी हैं ………यदि आप यह कह रही है तो आप उन्हें अल्पविकसित घोषित कर रही हैं……..जबकि आज की नारी आगे बढ़ने की सोचती है अपने वजूद के लिए जिसके लिए कोई भी संघर्ष करता है इसे किसी स्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा सकता देश में रेप और शोषण की घटनाएं ऐसी नहीं है की बढ़ गई है ……..हाँ यह जरुर है की अब दिखने लगी है पहले दिखती नहीं थी………हमें दुःख तो होना ही चाहिए किन्तु यह भी देखना चाहिए की अब ऐसे घटनाओं के खिलाफ आवाजे भी उठ रही है ……..आगे स्थिथि में परिवर्तन अवस्य होगा सुन्दर लेखनी के लिउए पुनः बधाई

    rajnithakur के द्वारा
    July 17, 2012

    आनंद जी,मै आपकी इस बात से सहमत हूँ कि अपने वजूद के लिए किए गए संघर्ष को स्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए लेकिन जब हमारी सामाजिक संरचना ही बेटा बेटी में फर्क मानती है और बेटियों को कमतर आंकती है तो अल्पविकसित घोषित करने जैसी कोई बात नहीं है. यही सच्चाई है क्योंकि चंद शहरों और महानगरों की बेटियों की प्रगति मिलकर पूरे देश की बेटियों की स्थिति निर्धारित नहीं कर सकते.. हाँ परिवर्तन हर कहीं दिख रहे हैं जो हममें आशा जगाते हैं.

rekhafbd के द्वारा
July 16, 2012

रजनी जी ,बहुत बढ़िया आलेख ,कई प्रश्नों को उठाते हुए ,मै आपके विचारों से पूर्णतया सहमत हूँ ,मैनेभी कुछ ऐसा ही लिखा है ,”पापा की है प्यारी में ”,समाज में यह बदलाव हमे ही लाना है ,बधाई बढ़िया आलेख पर बधाई

    rajnithakur के द्वारा
    July 16, 2012

    मेरे विचारों को अपनी सहमति प्रदान करने के लिए हार्दिक धन्यवाद रेखा जी..

nitesh ranjan jha के द्वारा
July 16, 2012

रजनी जी आज हम और हमारा वातावरण ये कभी नहीं चाहेगा की कोई अबला पर अत्याचार करे , लेकिन जो आपने सचाई कही है उस से भी हम अपना नजरिया नहीं फेर सकते है , जो हो रहा है गलत ही हो रहा पर ताना सही नहीं चले गी ये न तो कानून कहता है ना समाज इस लिए वहसी को कठोर से कठोर सजा हो यही आज की युवा पीढ़ी चाहती है पर उनमे एक जागरूकता की जरुरत है जो मकी आप की रचना के द्वारा ही संभव है एस लिय आप से विनाम्र निवेदन है की आप अपनी कोसिस एन रचना के द्वारा जारी रखे .

    rajnithakur के द्वारा
    July 16, 2012

    आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद नितेश भाई.. हाँ मेरी इस बाबत मेरी कोशिश हमेशा जारी रहेगी.

akraktale के द्वारा
July 15, 2012

रजनी जी सादर, सही लिखा है आपने मगर हम घूम फिर कर वहीँ आगये तो फिर हमने क्या पाया. आज लड़कियां रुकने वालों में से नहीं है. शासन को साथ देना चाहिए. क्योंकि अब वह दिन दूर नहीं जब पिता सत्ता या पति सत्ता में तेजी से बदलाव होगा.

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    सही कहा आपने, बदलाव तो हो रहे हैं पर कदम कदम पर रुकावटें हैं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही..प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद.

shashibhushan1959 के द्वारा
July 15, 2012

आदरणीय रजनी जी, सादर ! बहुत उग्र आलेख ! समाज के एक अंग के प्रति, जीवन-रथ के एक पहिये के प्रति, यानी पुरुष के प्रति आक्रोश से भरी रचना ! पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था का मुखर विरोध आपकी रचना में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है ! ऐसी रचनाओं की बाढ़ सी आई हुई है ! “”सीमा तय करेंगे ये वहशी-दरिन्दे ?”" यानी सीमा तय करेंगे ये पुरुष या पिता ? मैं नहीं जानता ऐसा लिखने के पीछे आपका क्रोधातिरेक है या पुरुष विरोधी मानसिकता, पर सम्पूर्ण पुरुष समाज को जो आपने कठघरे में खडा कर दिया है ! जबकि अपराधी कुछ ही हैं ! इसी पुरुष समाज में पिता, भाई, चाचा, मामा या अन्य-अनेक आते हैं ! और ऐसा भी नहीं है की अपराधी केवल पुरुषों में ही हैं, भंवरी देवी, सन्नी लिओन जैसी अनेक नारियां भी हैं, जिनके कृत्यों का कदापि समर्थन नहीं किया जा सकता और जो इन व्यभिचारी और बलात्कारी पुरुषों की श्रेणी में ही रखे जाने योग्य हैं ! रजनी जी, अगर परिवार के दो हिस्से कर दिए जायं, एक हिस्सा पुरुषों के लिए और एक हिस्सा स्त्रियों के लिए, और सबके रास्ते अपने-अपने हों, सभी अपने-अपने हिसाब से अपना जीवन जियें, कमायें-खाएं-उड़ायें….. क्या ये आपकी नजर में बेहतर होगा ! परिवार एक छोटा सा समूह है ! इन्हीं परिवारों का एक बड़ा समूह समाज है ! किसी भी समूह का नेतृत्व किसी एक के हाथ में होना चाहिए ! वह स्त्री हो या पुरुष, उससे कोई मतलब नहीं ! बहुत से परिवारों का नेतृत्व महिलायें ही करती हैं ! परिवार का मुखिया हमेशा अपने परिवार की सुरक्षा और बेहतरी के लिए सजग रहता है ! ऐसी उग्र बातें इतने कडवे तरीके से लिखने के पूर्व हम सभी को एक बार पुनः सोचना चाहिए ! (मैं अपनी बातें आपका विरोध करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ ! फिर भी मेरी किसी बात से आपको कष्ट हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ ! )

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    शशिभूषण जी, यकीन मानिये इस रचना का यह शीर्षक रखने के पीछे पुरुष या पिता को वहशी दरिन्दे शब्द से संबोधित करना मेरा उद्देश्य कतई नहीं था और यह संभव भी नहीं था क्योंकि मेरे पिता और भाई भी पुरुष ही हैं ! ..उस समय पिछली रात को घटित गोवाहाटी वाली घटना मेरे दिमाग छाई हुई थी. मेरा आशय यह था कि लड़कियों को सरेआम बेइज्जत करने वाले इन दरिंदों को यह अधिकार किसने दिया कि ये बहु बेटियों कि सीमाएं तय करते फिरें !! इसीलिए इस घटना का जिक्र मैंने अपने आलेख में भी किया है . साथ ही आप मेरी उस पंक्ति पर भी ध्यान आकृष्ट करने कि कृपा करें जिसमें मैंने ऐसे हालातों से लाख गुना बेहतर उस स्थिति को माना है जब बेटियां अभिभावकों के सख्त अनुशासन में रहती हैं.. “इन सवालों से परेशां मन में एक ख्याल यह भी आता है कि इस दुर्दशा के सामने माता पिता का सख्त अनुशासन लाख गुना बेहतर है ! अनुशासन की सीमाओं के अन्दर कम से कम बेटियों के वजूद और आत्म सम्मान की धज्जियाँ तो नहीं उडेंगी !” ..सम्पूर्ण पुरुष समाज नहीं बल्कि मैंने उन पुरुषों को कटघरे में रखा है जो बेखौफ मोरल पुलिस बनाकर गोवाहाटी जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं और अभिभावकों को अपने फैसले पर पुनः विचार करने को बाध्य कर देते हैं… शशिभूषण जी, ऐसी रचनाओं की बाढ़ तो अभी आएगी ही, जागरण जंक्शन फोरम ने जब बेटियों की स्थिति पर सबकी राय मांगी है तो अपनी अपनी बात कहने का अधिकार तो है न हमें ?

    nishamittal के द्वारा
    July 15, 2012

    रजनी जी ,ये सही है कि परिवार एक दुसरे के विरोध में खड़े होकर नहीं अपितु सहयोग से ही चल सकता है,यही नियम समाज पर लागू होता है,समाज में विकृत मानसिकता बढ़ने के कारण,आज कोई भी सुरक्षित नहीं दिखाई देता यही कारण है कि कभी गुवाहाटी का केस सामने आता है,तो कभी दिल्ली का और अधिकांश तो ऐसे भी होते हैं,जो या तो स्वयं भी मौन हो कर अपने ऊपर अत्याचार सहती हैं,या फिर उनके माता-पिता बेटी की शादी नहीं होगी ,मामले को दबाते हैं.यहाँ तक कि अबोध बालिकाएं भी परिवार के सदस्यों के द्वारा तथा शिक्षकों के द्वारा भी शोषित होती हैं,परन्तु इसका अर्थ ये तो नहीं कि सभी रिश्ते दागदार हैं बेटी को सर्वसुख प्रदान करने की भावना जहाँ पिता या पितृ तुल्य अन्य रिश्तों में होती है,तो भाई अपनी बहिन की रक्षा के लिए प्राणों पर खेल जाते हैं.पति ,पुत्र ,सभी अपने अपने रिश्तों के अनुसार दायित्व निभाते हैं. आपके शीर्षक के कारण कुछ बुरा लगा है जिसको देने का कारण हाल में घटित घटनाओं के प्रति आपका आक्रोश है,परन्तु सभी को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता.हाँ दोषी चाहे जो भी उसको कड़ी से कड़ी सजा मिलनी CHAAHIYE.

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    प्रिय दीदी, मेरी रचना के इस शीर्षक का कारण समूचा पुरुष वर्ग कदापि नहीं है बल्कि यह उनके प्रति मेरा क्रोध है जो बेटियों की सीमाएं तय करने के उद्देश्य से गुवाहाटी या दिल्ली जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं.. बिना पुरुष के न तो परिवार की संकल्पना पूरी हो सकती है और न ही समाज की, ऐसे में समूचे पुरुष वर्ग के लिए आक्रोश रखना निश्चय ही बेवकूफी होगी..

seemakanwal के द्वारा
July 14, 2012

रजनी जी माफ़ी चाहती हूँ आप का नाम गलत लिखा .

seemakanwal के द्वारा
July 14, 2012

रंजीता जी माँ बाप इन्हीं असामाजिक तत्वों के कारन अपनी बेटियों पर पहरे लगाते हैं टिकी बेटी घर में सुरक्षित रहे लेकिन ये तो कोई तरीका नहीं है फिर किया भी क्या जाये .आम आदमी करे तो क्या करे .घर से निकलते ही न जाते कब कहाँ ये दरिन्दे मिल जाये कुछ पता नहीं .

    bharodiya के द्वारा
    July 15, 2012

    माबाप का हक्क और जिम्मेदारी होती है की अपने बच्चों का ध्यान रख्खे और अनूशासन की डोर मजबूती से पकडे रख्खे । समाजद्रोहीयों ने वो डोर कमजोर कर दी या तोड दी, बच्चों की आजादी के नाम पर । बच्चे माबाप को पूछ ने भी नही रहते वो कहां जाते हैं, क्या करने जा रहे हैं । बस अपने आप उड निकलते है । गिरते हैं तो कभी शराब के अड्डे पर, कभी रेव पार्टी द्वारा पूलिस की गाडी में या गलत जगह पर गीर के अपने शरीर का बलात्कार करवा लेते है । और कभी अपना अपहरण या खून भी करवा लेता है । माबाप को अगर पूछता तो वो अपने अनूभव से बता सकते हैं बच्चे, समय या जगह जाने लायक नही है । बच्चे माबाप के हाथमें नही रहे । किस का कसुर है ? भारत का सबकुछ ढिला करने की चाह रखने वाले देशद्रोहियों का । वो चाहते हैं की अमरिका जैसा समाज यहां भी हो जाये । वहां बच्चे को उस का बाप थप्पड भी मारता है तो पूलिस बाप को उठा ले जाती है । बच्चे ईतने आजाद हो गये हैं की अपनी चीजों मे कोंडोम भी रखने लगे हैं । वहां भारत की तुलना में बलात्कार का प्रमाण शायद कम होगा । लेकिन आदमी अच्छे है ईस लिए नही, बल्के ईसलिए की वहा अपने आस पास सेक्स आसानीसे मिल जाता है । “आती है क्या खंडाला” कहनेवाला चप्पल नही खाता । या तो उस का काम बन जाता है या “नोट नाउ” जैसी मुस्कान ही पाता है । आदमी को कोइ जरूरत नही बलात्कार करने की । फ्री सेक्स है भाई, एकने मना किया तो दुसरी को पूछते हैं, “आती है क्या खंडाला” । भारत में कौन से माबाप चाहेंगे की उनका बेटा ऐसा वाक्य बोले या उन की बेटी पहली या दूसरी बन के ये वाक्य सुन ले । वो तो चप्पल मारना ही सिखायेंगे । लेकिन चप्पल या जुते मारना माबाप को खूद सिखना होगा । उनको जुते चप्पल मारने होंगे जो भारत के सामाजिक ढांचे को तोड रहे हैं ।

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    सीमा जी,आज की बेटियों के लिए भी अपनी पहचान हासिल करना उतना ही जरुरी होता जा रहा है जितना कि बेटों के लिए.. ऐसी स्थिति में कदम आगे बढाकर फिर पीछे खींचना निश्चित ही तकलीफदेह है,न सिर्फ बेटियों के लिए बल्कि उनके अभिभावकों के लिए भी, जो ज़माने के हिसाब से चलना चाहते हैं लेकिन जैसी घटनाएँ सामने आ रही हैं,वो किसी भी पिता या बेटी के हौसले को सिर्फ चोटिल ही कर सकते हैं..

yamunapathak के द्वारा
July 14, 2012

रजनीजी आपका आलेख बहुत सुन्दर है.लड़कियां पराई होती हैं अगर यह हमारा समाज मानता है तो फिर पुरे विश्व में अपना परचम फहराने वाली इंदिराजी नेहरूजी के लिए पराई कैसे ना हो सकी.आज भी गांधी वंश उन्ही के नाम से आगे बढ़ रहा है . “रोशन हैं दो घर तुझसे “इस ब्लॉग को थोडा सा वक्त दें शायद हम जैसे अभिभावकों की सोच ही समाज को नए आयाम दे सके.

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    प्रिय यमुना जी, बेहद सशक्त उदाहरण दिया आपने.. यहाँ बेटियों को इंदिरा गाँधी बनने की प्रेरणा तो दी जाती है पर उनके पीछे नेहरु जी बनकर खड़े होने हिम्मत बहुत कम अभिभावकों में देखने को मिलती है ! प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद

    bharodiya के द्वारा
    July 15, 2012

    आजकल बेटियों को गुमराह किया जा रहा है । तूझे तो तेरे माबाप बोज समजते हैं । तूझे दुसरों के घर भेज देना चाहते हैं, जहां तूझे एक बहु के रूपमें गुलाम बन के रहना है । कम अकल लडकी तो बहक जायेगी । विद्रोही बन जायेगी । पुरुष जात से नफरत करने लगेगी, और शादी करने से ही ईन्कार करेगी । समजदार लडकी बहक नही जाती । वो जानती है उस का अंतिम लक्ष सेक्स, बच्चे और घर परिवार ही है । जीस के लिये उसे दुसरे घर जाना तो पडेगा ही । अगर कोइ लडकी पढ लिख कर खूद कमाना जानती है तो सिर्फ अपने लिए नही कमाती है । अपने बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए कमाती है । अगर कोइ लडकी के माबाप लडका देखने में देर करते हैं तो लडकी खूद ढुंढ लेती है, कटी पतंग बन जाती है । माबाप से नाता तोड भाग कर शादी कर लेती है । ये बहुत बडा सबूत है की लडकियों को कितनी चाह होती है दुसरे घर जाने की । उसे कोइ कोई दुःख नही है । दुःख सिर्फ उन सरफिरों को लगता है जो ऐसी बहस चलवाता है की “बेटी पराई है” । “बेटी पराई है” जैसे भावनात्मक शब्दों पर समाज नही चलता । कोइ लडकी अपने से छोटी उमर की सहेली की शादी में जाती है तो असहज हो जाती है । पूछनेवालों का भी डर सताता रहता है, ”तेरी कब बारी है ?” घर आने पर उदास हो जाती है । लडकेवाले उसे नापसंद करते हैं या वो लडके को ना पसंद करती है तो उस घटना को सहना मुश्किल होता है । पढी लिखी लडकियों की अकल भी आजकल ठिकाने पर आ रही है । सही लडके को कोइ घरेलु लडकी उडा ना ले जाये ईस लिए वो भी जल्दी कर रही है । लडकियों की बात सही है । देर करनें मे नखरेवाले लडके ही बचते है, या निकम्में बचते हैं । किधर टिकपाती है “बेटी पराई है” वाली बात ?

Rajesh Kumar के द्वारा
July 14, 2012

सोच बदलने की जरूरत है। बहुत सुन्दर आलेख ।

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    उत्साह बढ़ने के लिए बहुत धन्यवाद राजेश जी.

R K KHURANA के द्वारा
July 14, 2012

प्रिय रजनी जी, बेतिया हमेशा माँ- बाप का बेटों से ज्यादा ख्याल रखती है ! परिवार से दूर रहकर भी परिवार के बारे में ही सोचती हैं ! लेकिन समाज ने उनको पराई होने का दर्जा दे रखा है ! अब समय आ गया है इस सोच को बदलने का ! राम कृष्ण खुराना

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    आदरणीय खुराना जी, बेटियों को पराई माननेवाली सोच को बदलना ही होगा और यही समय का तकाजा भी है ..प्रतिक्रिया देकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए आभारी हूँ .

    jlsingh के द्वारा
    July 15, 2012

    आदरणीय रजनी जी, नमस्कार! मैं भी खुराना चाचा की बैटन से सहमत हूँ!

jeet abhishek के द्वारा
July 14, 2012

respected mam, It is well said “Mediocrity knows nothing higher than itself, but talent instantly recognizes genius” once again your words have posed a great slap on the face of our socialistic thinking,On one hand we are boasting of 21st century liberalisation yet on the other we have wrapped ourself on the shackles of orthodoxical beleifs.The question is when and how it can be removed?today girls posses equal rights and they also have rights to flourish and develope themself but the accidents mentioned above are some of the critical conditions that’s prevailing in day today life in India.There must me some proper steps that shoud be taken in order to upliftment of girls from orthodoxy and accidents.Girls have great potential and we the people of india will have to come forward to save their innocence. REALLY GREAT WORDS FROM U KEEP ON WRITING BEST WISHES

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    “girls have great potential and we’ld come forward to save their innocence” thanks a lot Jeet for your optimistic comment.

Rajesh Dubey के द्वारा
July 14, 2012

बेटी हनेशा बेटा से अव्वल है. श्रेष्ठता में बेटियों का जोड़ नहीं है. लेकिन बेटों से तुलना कर के बेटियां अपना दर्जा गिरा देती है.

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    राजेश जी, काश आपकी यह सोच उन अभिभावकों को भी प्रभावित करे जो इन दोनों में काफी फर्क मानते हैं ! ..प्रतिक्रिया के लिए बहुत धन्यवाद.

jagojagobharat के द्वारा
July 14, 2012

बहुत सुन्दर आलेख आज जिस प्रकार बेटियो के साथ अन्याय हो रहे है वह एक सभ्य समाज के लिए कतई अच्छा नहीं है.आप की बातो से पूर्ण सहमत बहुत सुन्दर आलेख

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    राजेश जी, आलेख पसंद करने के लिए बहुत धन्यवाद.


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