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क्यों पापा..? Jagran Junction Forum

Posted On: 11 Jul, 2012 Others में

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हमारे समाज में आज भी अधिकांश बेटियों की शादी में उसकी स्वीकृति के बजाय घरवालों की मर्जी ज्यादा मायने रखती हैं | ऐसे में मैंने इस रचना के माध्यम से उन बेटियों का दर्द बयां करने की कोशिश की है जिनकी महत्वाकांक्षाएं, प्रतिभा और सपने विवाह की जिम्मेवारियों तले दबकर कहीं गुम हो जाते हैं !

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क्यों पापा ?
============
वो देखो दुनिया
बढ़ गई कहाँ से कहाँ !
मैं ही छुट गई पीछे
पर अब मैं भागूं कैसे ?
बेड़ियाँ मेरे पांवों में
किस जुर्म की डाली हैं पापा !

==================
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मेरे भी कुछ सपने थे
आकाश छूने का अरमान था
होनहार है बेटी कहते थे !
फिर क्यों आँखों पर पट्टी
बंधवा दी है बोलो पापा !

================
मेरे घर की नहीं पराई है तू
लेकिन मैं ये मान लूँ कैसे !
आपकी हर मायूसी में
क्यों रोती हैं मेरी आँखें !

=================
मेरे वजूद के टुकड़े कर के
पराया कर दिया क्यों पापा ?
आपने दामन झटक लिया तो
कहाँ कौन मेरा अपना होगा ?

====================
गिर गिरकर खुद संभलूँगी मैं
कभी सपनों का सवेरा होगा !
जब लता सी बांहें उर्जित होंगी
वो भी बनेंगी सहारा किसीका
!
====================

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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nitesh ranjan jha के द्वारा
July 15, 2012

एक कवी की सोच को तो उसकी रचना बताती है की वो कितना गहरे से हमारे समाज की व्यथा को जानती है जिसमे श्री मति रजनी ठाकुर जी नै अपने कविता के माध्यम से एक बहुत ही बड़ी बात हम लोगो के सामने रखा है , इस कविता में हर एक बात एक सच्चाई को वतायित कर रही है.में तहे दिल से सुक्रियादा करता हु की आप ने एस रचना के माध्यम से हम लोगो तक ये बात कही है. जो बहुत ही ख़ास है,

    rajnithakur के द्वारा
    July 16, 2012

    आपका भी बहुत धन्यवाद :)

Alka Gupta के द्वारा
July 15, 2012

बेटियों की अंतर्वेदना को बहुत ही सुन्दर शब्द दिए हैं रजनी जी भावप्रधान रचना के लिए बधाई

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    बहुत धन्यवाद अलका जी, रचना पसंद आई, मेरा प्रयास सार्थक हुआ :)

ashishgonda के द्वारा
July 15, 2012

किसी लड़की के दिल के दर्द का शब्दों में सीधा चित्रण किया गया है. मैं उन सभी लड़कियों की तरफ से आपको धन्यवाद देता हूँ. http://www.ashishgonda.jagranjunction.com/ रामसेतु तोडना कितना उचित कितना अनुचित

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    मेरी लेखन को सार्थकता देने के लिए आपको भी बहुत धन्यवाद आशीष जी.

jlsingh के द्वारा
July 15, 2012

आपने दामन झटक लिया तो कहाँ कौन मेरा अपना होगा ? गिर गिरकर खुद संभलूँगी मैं कभी सपनों का सवेरा होगा ! मेरी लता सी बांहें उर्जित होंगी और वो भी आपका सहारा होगा ! रजनी जी, समयानुकूल रचना! बधाई!

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    प्रतिक्रिया देकर मेरा उत्साह बढ़ाने के लिए बहुत धन्यवाद सिंहजी :)

Dr. Aditi Kailash के द्वारा
July 15, 2012

रजनी जी, बेटियों का दर्द बयां कराती भावपूर्ण रचना के लिए बधाइयाँ………

    rajnithakur के द्वारा
    July 15, 2012

    प्रतिक्रिया देकर मेरा उत्साह बढ़ने के लिए धन्यवाद अदिति जी.:)

Rajesh Kumar के द्वारा
July 14, 2012

बहुत सुन्दर एवं सुखद

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    धन्यवाद राजेश जी.

manoranjanthakur के द्वारा
July 14, 2012

सुन्दर भाव लिए सरल प्रबाह में लिखी सुखद कविता बधाई

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    प्रतिक्रिया देकर मेरा हौसला बढ़ने के लिए बहुत धन्यवाद मनोरंजन जी.

munish के द्वारा
July 14, 2012

आदरणीय रजनीजी शायद पहली बार मैं आपके ब्लॉग पर आया हूँ ….. आपकी कविता पढ़ी …… अच्छी है अच्छे भाव प्रदान किये हैं आपने और जब पाठक इस कविता से पूरी तरह जुड़ता है तभी कविता अचानक पूरी हो जाती है कुछ अधूरी सी रह जाती है ………..? ऐसा क्यों ?

    rajnithakur के द्वारा
    July 14, 2012

    मुनीश जी, आप पहली बार मेरे ब्लॉग पर आए हैं,स्वागत है :) बात अधूरेपन की तो इन बेटियों का वजूद,सपने और संघर्ष.. सभी कुछ अभी अधुरा सा ही तो है, ऐसे में यह कविता कैसे पूरी लगेगी !

jeet abhishek के द्वारा
July 13, 2012

Dear mam, the above poem truely depicts the problems faced by girls in our rural society.Your words have spoken better then the deeds.Atleast now the society should come forward and preserve the rights of girls and being in the chain of this secular,democratic and socialistic society your poem had brought out the words and emotions that brought the deepest grief of a soul of girl. congrats and plz keep on writing

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    Many Thanks Jeet, for your wonderful response..:)

rekhafbd के द्वारा
July 13, 2012

रजनी जी , मेरे घर की नहीं पराई है तू लेकिन मैं ये मान लूँ कैसे ! आपकी हर मायूसी में क्यों रोती हैं मेरी आँखें !,बेहद खूबसूरत रचना ,बधाई

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    प्रिय रेखा जी, रचना पसंद आई तो मेरा प्रयास सार्थक हो गया.:) धन्यवाद

deepaksharmakuluvi के द्वारा
July 13, 2012

REALLY WONDERFUL……………….

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    Thanks Deepak for your wonderful response.

Mohinder Kumar के द्वारा
July 13, 2012

रजनी जी, भावप्रधान सुन्दर शब्दों से सजी रचना जिसमें एक अनव्याही अधेडपन की और बढती बेटी का दर्द हिलोंरे मार रहा है… लिखती रहिये.

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    मोहिंदर जी, प्रतिक्रिया देकर मेरी हौसला अफजाई के लिए बहुत धन्यवाद.

Chandan rai के द्वारा
July 13, 2012

रजनी ठाकुर , मानवीय संवेदना के छल का इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता की उसके पाले पशुं में उसे मादा प्रजाती में अपनापन नजर आता है ,पशुओं का नर समुदाय मानवीय संवेदना की उपेक्षा का शिकार रहता है, गाय ,बैल ,और जाने कितनी प्राजाति , पुराने समय में बनाये इस घटिया प्रर्था पर मुझे क्षोभ आता है , आज गर बेटिओं की विदाई रोक दे तो देखिएगा ,लोग बेटिओं के जन्म की दुआ मांगेंगे, आज बेटियाँ स्वावलंबी है तो समाज का नजरिया भी बदल रहा है , सच पूछिए तो रिश्ते बस पैसे से चलते है , सायद इसलिय लोग बेटिओं को बोझ और पराया समझते है , जिसने भी इस प्रथा को शुरू किया था , हम आज भी उसके जाल में फसे हुए है

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    चन्दन जी, इस प्रथा की शुरुआत कहाँ से हुई ये तो पता नहीं पर यह हमारी सामाजिक मुलभुत संरचना के साथ युगों से रचा बसा है… आज की बेटियों ने खुद को साबित कर दिखाया है और उनकी यह स्थिति वर्षों के संघर्ष का परिणाम है ,जिसे आज का पुरुष सत्तात्मक समाज अभी तक स्वीकार नहीं कर पा रहा !

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
July 13, 2012

रजनी जी, आपकी कविता में उठाये गए सवाल बहुत ही लाज़मी हैं… लड़कियों को आज भी दब कर रहने पर मजबूर होना पड़ता है… किन्तु इसका कारण स्वयं लड़कियां नहीं हैं, बल्कि पुरुष की ही मानसिकता ऐसी है जिस वजह से वह अन्य पुरुषों से अपनी लड़कियों, माताओ और बहनों को बचाना चाहता है…उसे पता है अन्य पुरुष भी उसी की तरह अन्य बहु-बेटियों को अच्छी नज़रो से नहीं देखते…. दोष पुरुष का सजा स्त्री को…ये ज़माने का दस्तूर न जाने कब बदलेगा?

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    अनिल जी, अपनी बहन बेटियों को पराए पुरुषों की मानसिकता से बचाने की कोशिश में तो हम हमेशा ही लगे रहते हैं पर यही कोशिश दूसरों की बहन-बेटियों के लिए की भी जाए तो समस्या जड़ से ही ख़त्म हो जाएगी ! प्रतिक्रिया हेतु अत्यंत धन्यवाद.

pritish1 के द्वारा
July 13, 2012

आप अपने शब्दों में अपने विचारों को समटने में सक्षम है…..आपकी रचना अच्छी लगी धन्यवाद..!

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद प्रीतिश जी.

shashibhushan1959 के द्वारा
July 13, 2012

आदरणीय रजनी जी, सादर ! बेटियों के अव्यक्त दर्दों को शब्द देती रचना ! मानसिक द्वंद्व की वेदना ! पिंजरे के भीतर कैद होने की वेदना ! आसमान में खुलकर उड़ने की आजादी से मरहूम रहने की वेदना ! तरह- तरह की वन्दिशों की वेदना ! बहुत सुन्दर चित्रण ! पर कभी स्वयं को पिताओं की जगह पर रख कर सोचिये ! एक नयी दिशा मिलेगी ! सशक्त रचना ! सादर !

    rajni thakur के द्वारा
    July 13, 2012

    सच में..पिछली रात सुर्ख़ियों में रही गोवाहाटी वाले खबर के बाद तो यही लग रहा है की पिताओं की चिंता आज भी अपनी जगह कायम ही है, कही कोई विशेष बदलाव नहीं आया ! …इतनी सुन्दर प्रतिक्रिया हेतु आभार शशि भूषण जी.

    Ajay Kumar Dubey के द्वारा
    July 13, 2012

    रजनी जी इस गोहाटी की घटना को आपके सामने मैं स्वयं भी रखने जा रहा था. इसकारण से ही पुनः आपकी इस पोस्ट पर आया भी हूँ…देखा आपने स्वयं ही इस घटना को संज्ञान में लिया है…ऐसी घटनाएँ प्रतिदिन घटती हैं.. हर क्षेत्र में होती हैं..बहुत सारी घटनाओं को दबा दिया जाता है…जिनके परिवार में ऐसी घटना हो जाती है उन पर क्या गुजरती होगी आप समझ सकती हैं…कितना शर्मसार होना होता होगा…उफ़… समय बदला, समाज बदला, विकास हुआ लेकिन व्यक्ति कि मानसिकता दूषित होती गयी…नैतिक पतन होता जा रहा है..इंसान हैवान होता जा रहा है… आखिर एक पिता अपनी बेटी को लेकर क्यों ना चिंतित हो..कैसे अकेली छोड़ दे इन दरिंदों के बीच… वह भी तो चाहता है कि उसकी बेटी आगे बढे..उन्नति करे..स्वाबलंबी हो..खुशहाल रहे… लेकिन….

    rajnithakur के द्वारा
    July 13, 2012

    इसी ‘लेकिन’ का तो जवाब नहीं मिलता अजय जी ! एक तरफ बदलते युग के साथ बेटियों की छवि बदलने की जिद है तो दूसरी तरफ इंसानियत को शर्मसार करनेवाली ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो हमारे इस विश्वास की धज्जियाँ उड़ा जाती हैं कि जमाना सच में बदल गया है..

yogi sarswat के द्वारा
July 12, 2012

मेरे भी कुछ सपने थे आकाश छूने का अरमान था होनहार है बेटी कहते थे ! फिर क्यों आँखों पर पट्टी बंधवा दी है बोलो पापा ! मेरे घर की नहीं पराई है तू लेकिन मैं ये मान लूँ कैसे असल में रजनी जी ये एक सामाजिक समस्या ही है की बेटी कितनी भी योग्य हो उसके लिए एक सीमा तैयार कर दी जाती है ! बहुत ही सुन्दर सवाल !

    rajnithakur के द्वारा
    July 12, 2012

    ..जिस सीमा के अन्दर अपने लिए कुछ बेहतर करने की जद्दोजहद हमेशा ही चलती रहती है बेटियों की, उनकी इस अनथक एवं अपराजित जज्बे को सलाम ! .. प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद योगी जी.

R K KHURANA के द्वारा
July 12, 2012

प्रिय रजनी जी, बेटी के दर्द को बयां करती सुंदर कविता ! पहले के और आज के ज़माने में फर्क आ गया है लेकिन माँ बाप अब भी अपनी बेटी को नासमझ ही समझते है और उसका ख्याल रखने के कारन अपनी मर्जी चलते है ! क्योकि उनको दुनिया का अनुभव होता हो ! राम कृष्ण खुराना

    rajnithakur के द्वारा
    July 12, 2012

    आदरणीय खुराना जी, सही कहा आपने. जमाना बदल चूका है जिसके हिसाब से बेटियां भी ढलना चाहती हैं पर पिताओं की मानसिकता में अभी भी बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है…आपकी अनुपम प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ .

nishamittal के द्वारा
July 12, 2012

बहुत दिन पश्चात आपकी बेटियों के ज्वलंत प्रश्नों से भरपूर रचना पढी .स्वागत आपका रचना अच्छी लगी

    rajni thakur के द्वारा
    July 12, 2012

    आदरणीय निशा जी, काफी दिनों बाद आप रूबरू हुई हैं,बेहद ख़ुशी हुई . रचना पर आपकी प्रतिक्रिया देखकर मेरा हौसला बढ़ गया :) हार्दिक धन्यवाद

dineshaastik के द्वारा
July 12, 2012

रजनी जी बहुत ही सुन्दर, एक बेटी की पीड़ा की वास्तविक प्रस्तुति, बधाई…..

    rajni thakur के द्वारा
    July 12, 2012

    दिनेश जी, प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद.

Ajay Kumar Dubey के द्वारा
July 11, 2012

एक पिता के दर्द को जाने कौन…पापा की चिंता….को जानिए उत्तर मिल जायेगा….

    rajni thakur के द्वारा
    July 12, 2012

    अजय जी, आपने पापा के चिंताओं की याद दिलाई पर सवाल जहाँ बेटी की पूरी जिंदगी का है तो प्रचलित मान्यताओं को विराम देते हुए बदलते परिवेश के हिसाब से ढलने में ही समझदारी है.


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