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यहीं तय होती हैं जोड़ियाँ

Posted On: 4 Jan, 2012 Others में

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8985665-appearance-of-woman-face-in-black-grey-and-white-spots-vector[1] कहते हैं जोड़ियाँ आसमानों में बनती हैं पर हाल के अनुभवों ने मेरी इस धारणा को काफी हद तक बदल कर रख दिया है | हुआ यह कि अपने पहचानवालों की मदद के उद्देश्य से मैंने दो विवाहयोग्य कन्याओं के प्रोफाइल एक विवाह साईट पर डाल दिए | सोचा कि वह अपने स्तर पर प्रयासरत हैं ही, अगर मुझसे उनकी कुछ मदद हो जाएगी तो इसमें कोई बुराई नहीं है| इसके बाद शुरू हो गया ऐसे अनुभवों का दौर जिसने मुझे परेशान कर दिया | मैं यह सोचने पर विवश हो गई हूँ कि आज के इस “मॉडर्न एज” में भी कन्याओं का विवाह अधिकतर इस बात पर निर्भर करता है कि उसके अभिभावक कितना इन्वेस्ट कर सकते हैं !
जिन दो कन्याओं के प्रोफाइल मैंने डाले थे उनमें पहली मिडिल अपर क्लास की है- स्मार्ट और लम्बी, इसके अभिभावक को पैसे खर्चने में कोई समस्या नहीं है| क्लास वन या टू का लड़का चाहिए | दूसरी एम्.काम., खुबसूरत और सामंजस्यपूर्ण प्रवृति की- इसके अभिभावक आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के हैं इसीलिए कोई भी आत्मनिर्भर लड़का चलेगा| दोनों लड़कियां कामकाजी हैं | समस्या यह की दोनों को मैथिल ब्रह्मण लड़का ही चाहिए और बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में दहेज़ का तांडव कुछ ज्यादा ही है | अब सुनाती हूँ अपनी कहानी |
पहली के लिए मैंने दो सिविल सेवारत अफसरों को चुना | दोनों ने मेरी पहल को स्वीकृत किया | पहले वर के संपर्क नंबर पर बातचीत शुरू हुई | यहाँ धीरे धीरे मुझे इस बात का अंदाजा हो गया कि यहाँ लड़के की कोई रूचि नहीं थी पर सम्बन्धी झूठे आश्वासन दिए जा रहे थे अपने 35 -40 लाख के बजट के साथ ! दुसरे लड़के से सीधी बातचीत हो गई | उसने फोटोस और बायोडाटा माँगा जिसे मैंने भेज दिया | इसके बाद उसने समय आने पर संपर्क करने का भरोसा दिया |
इसी दौरान एक बार यात्रा के क्रम में एक ऐसे बुजुर्ग दंपत्ति से मुलाकात हुई जो उन आईएएस के परिचित थे | उनहोंने बताया कि वह महोदय तीन सालों से फोटो और परिचय जमा कर रहे हैं और लड़कीवालों की ऊँची बोली तोल रहे हैं | तीसरा लड़का न्यू जर्सी में कार्यरत था | इन्हें संस्कारी मैथिल ब्रह्मण कन्या चाहिए थी | वहां कई बार सकारात्मक बात हुई, और बात जब अंतिम चरण में पहुंची तो पता चला कि उन्हें गाँव में बसे अपने माता पिता की सेवा के लिए बीवी चाहिए |

अब आती हूँ दूसरी पर | यहाँ दहेज़ की बात पर संशय की स्थिति थी अतः मैंने कहीं पहल नहीं की और उसके प्रोफाइल में ही दहेज़ न देने की बात स्पष्ट कर दी | उसकी खुबसूरत फोटो और योग्यता से प्रभावित होकर प्रस्ताव आने शुरू हो गए | (मुझे ऐसा ही लगा था) ! पहला प्रस्ताव था रेलवे के एक तृतीयवर्गीय कर्मचारी की | बिना पूछे ही उसने आधे घंटे तक अपने गुणों का बखान किया और अपने ऑफिसर क्लास का निर्धारण भी ! अब मेरी बारी थी | मैंने बेबाकी से उसका “दाम” पूछ लिया तो उसने उतनी ही बेबाकी के साथ 10 -15 लाख का हिसाब-किताब दिखा दिया | दुसरे लड़के को उसकी आर्थिक स्थिति से कोई मतलब नहीं था | मैंने इश्वर को धन्यवाद दिया पर दूसरे ही पल उसने लड़की का मोबाईल नंबर मंगाते हुए कहा कि अभी एक डेढ़ साल विवाह कि कोई योजना नहीं है |
“तो फिर अभी नंबर लेकर क्या करोगे ?” “अरे आज के ज़माने की हैं आप ! लड़की को जानना- पहचानना भी तो जरुरी है |”
“एक डेढ़ साल तक ?…सॉरी भाईसाहब !” कहकर फोन रख दिया |
तीसरे लड़के की अपनी कोई मांग नहीं थी पर उसके पिता को सम्बन्धियों के बीच अपनी प्रतिष्ठा कायम रखनी थी- लड़के के पिता होने का !! आखिर उसे अपनी बहन की शादी में भी तो दिल खोलकर खर्चे करने पड़े थे !
दो भिन्न आर्थिक वर्गों के दो प्रस्ताव- पर मेरे स्तर पर कही बात बन नहीं पाई | एक दहेज़ दे रहा है और दूसरा अपनी गुणी बेटी पर कहीं निर्वाह नहीं | मैं उनसे क्षमा चाहती हूँ | ….इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने देश में शादी विवाह को लेकर धारणाओं में काफी परिवर्तन आया है पर महानगरीय सभ्यता व सोच हर जगह लागू नहीं की जा सकती | इस मामले में उत्तर भारतीय राज्यों का यह हाल है कि अधिकांश पढ़े लिखे- समर्थ लड़के भी मिलनेवाले दहेज़ के बूते समाज में अपनी योग्यता और महत्ता प्रमाणित करना चाहते हैं |

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

nancy4vaye के द्वारा
February 27, 2012

नमस्ते प्रिय! मेरा नाम नैन्सी है, मैं अपनी प्रोफ़ाइल को देखा और अगर आप कर रहे हैं आप के साथ संपर्क में प्राप्त करना चाहते मुझ में भी दिलचस्पी तो कृपया मुझे एक संदेश जितनी जल्दी भेजें। (nancy_0×4@hotmail.com) नमस्ते नैन्सी ***************************** Hello Dear! My name is Nancy, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (nancy_0×4@hotmail.com) Greetings Nancy

mparveen के द्वारा
January 5, 2012

रजनी जी बिलकुल सही कहा आपने यही हाल है आज … समाज में व्याप्त इस दहेज़ रुपी बुरे को कुछ लोग कहते है की हम दहेज़ नहीं लेंगे. लेकिन फिर दूसरी तरफ कहते हैं की लड़की को जो आप देना चाहो दे दो हमने भी अपनी लड़की की बड़ी शान से शादी की थी. ये होती हैं indarectly मांग.. मना भी कर देंगे और मांग भी लेंगे …… बहुत अच्छी पोस्ट बधाई हो !!!! http://mparveen.jagranjunction.com/

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 5, 2012

    बड़ी पुरानी कुप्रथा है परवीन जी, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मांगना या देना अब तो शादी विवाह का ही एक जरुरी हिस्सा लगता है |

Tamanna के द्वारा
January 5, 2012

रजनी जी, आपने अपने इस लेख के माध्यम से समाज की हकीकत सामने रख दी हैं. दहेज रूपी दानव आज के युवाओं विशेषकर युवतियों के भविष्य को अंधकार के गर्त में ढकेलता जा रहा है. इससे पार पाना दिनोंदिन मुश्किल ही होता जा रहा है. http://tamanna.jagranjunction.com/2012/01/05/importance-of-post-cards-and-letters-in-old-times-changing-scenario-and-relevance-of-greeting-cards-old-memories/

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 5, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद तमन्ना जी, आज की युवा की मानसिक समझ और शैक्षिक स्तर में पहले के मुकाबले काफी फर्क आ चुका है फिर भी इस समस्या का पार नहीं मिल रहा..

minujha के द्वारा
January 5, 2012

रजनी जी नमस्कार एक गंभीर विषय पर बहुत बढिया लिखा है आपने, बहुत सारे कारणों ने मिलकर पहले ही विवाह प्रक्रिया  को जटिल बना दिया है उस पर से दहेज की त्रासदी सोचने पर मजबुर करती है.

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 5, 2012

    हौसला अफजाई के लिए आभारी हूँ मीनू जी..यहाँ इस मुद्दे को उठाने का मेरा मकसद भी यही है कि हम बदलावों कि चाहे जितनी दुहाई दे दें पर यह कुप्रथा अभी तक अपने सनातनी ढांचे से निकलने को हिचक रहा है |

jlsingh के द्वारा
January 5, 2012

रजनी जी, नमस्कार! और नव वर्ष की शुभकामना! आपने ब्लॉग के माध्यम से अच्छे विषय को उठाया है. पर समस्या वही है जो आपने रक्खी है. दहेज़ से सम्बंधित आपको बहुत सारे अनुभव होंगे. ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे जो लडकी की योग्यता देखकर दहेज़ से इनकार कर दें! ब्याव्हारिकता यही है. पर कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो लडकी को प्राथमिकता देंगे. धन्यवाद और बधाई!

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 5, 2012

    काश ! वो सही लोग जरुरतमंदों को मिल जाएँ..

RaJ के द्वारा
January 4, 2012

रजनी जी यह एक विषय जिस पर में शोध करना चाहता था | दहेज़ , दानव, और मांगने वाले को कई सींग और नाखुनो वाला मुहं में खून लगा लड़के को बेचने वाला जल्लाद होता है | अब हर घर में लड़के लड़की दोनों होते हैं दोनों की शादी होती है और दोनों वक़्त लेन देन होता है | पता नहीं कि कब एक ही व्यक्ति लड़की माँ बाप होते कुलीन और संस्कारित हो जाते हैं और कब लड़के शादी में राक्षसी | मेरे कुछ कथनों पर मेरी खुद की पत्नी भड़क जाती जब में कहता की लड़की के असली दुश्मन उसके माँ बाप है जोकि उसके असली हक जिसे जीतेन्द्र कुमार भारती Hindu Succession Act कहा को , कभी नहीं देते | मेरी एक analysis यह है कि एक परिवार जसमें एक लड़का लड़की है उसमे लड़की को दहेज़ में कितना ही दिया जाये (वह भी खूब कोस कोस कर) वह भी लड़के के हिस्से में आयी जमीन मकान fixed assets का कुछ प्रतिशत भी नहीं होता | पर यह सब देते वक़्त इतना हो हल्ला दयनीयता का माहोल बना दिया जाता है कि आज जो लड़की किसी परिवार में बहु बनके अपना स्थान बनाने वाली है पहले से ही उस घर लिए विष से भरी भावना लेकर जाता है | मैंने अपनी बहनों कि शादी के वक़्त माँ को हमेशा मन किया कि वे भावी पति या उस के घरवालों को यह कहकर न कोसे कि इतना खर्च करवा रहें हैं \ और हिसाब लगाकर बताया कि आप जो लडको के लिए अपनी सम्पति से छोड़कर जाओगे वह कई गुना ज्यादा है | आज भी रस्म रिवाजों तहत बहनों को या उनके परिवार विभिन्न उपलक्ष में कुछ देना हो तो में हमेशा यही मानता हूँ उनका बाकी बहुत बचा वाही किश्तों में प्यार व सम्मान से दे रहा हूँ | हाँ जिन परिवारों कि आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब वहां उनकी कुल सम्पति से ज्यादा का लेन देन हो तो काफी शोचनीय | प्रश्न वहीँ आकर खड़ा हो जाता है क्या सभी लड़किओं को अपने माँ बाप से उनकी संपत्ति कुछमिल पता है पर उसको घुमा इस तरह दिया जाता है कि शादी के समय दिया जाने वाला धन व सामान दहेज़ बना दिया जाता है | कुछ बुजुर्ग जिनका सारा जीवन दर्शन ही व्यापारिक हो उन्हें कहते सुना है कि लड़की लड़के से कम पैसे खर्च कराती है एक बार शादी में लगा दो तो जिंदगी भर का एहसान उतर जाता है | एक और जुमला एक बहुत ही घिसे हुए बुजुर्ग से सुनने को मिला अरे हम तो अपने लड़के कि शादी बिना एक पैसे के लेन देन के कर रहे है ,बस लड़की एक जोड़ा जो कपडा पहना है उसमे आ जाये , साथ ही उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया था कि वह माँ बाप कि इकलोती बेटी हो जिसे अपने माँ बाप कि सारी अकूत दौलत मिलने वाली हो } यह विचित्र रिवाज़ जिसे दहेज़ प्रथा कहते हैं निश्चित ही लड़की पर भारी है पर गलत माँ बाप ज्यादा है जो उसका वाजिब हक का कुछ हिस्सा भी इतना मन मसोस के देते है या फिर लड़के के घर वाले जो जरुरत से जयादा मांग रखकर अपनी बहु के लिए तमाम मानसिक क्लेश पैदा कर देते हैं |

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 5, 2012

    राज जी, आपकी विस्तृत प्रतिक्रिया हेतु आभार..मैं इस मामले में आपकी राय से पुर्णतः सहमत हूँ | सच में सक्षम है वो बड़े गौरवान्वित भाव से दहेज़ देते हैं, पर यह समस्या उनके लिए बन जाती है जो नहीं दे पाते और मज़बूरी में बेटी का विवाह कहीं भी करवाने को राजी हो जाते हैं..

jitendra kumar bharti के द्वारा
January 4, 2012

देखने में तो यही आता है की बेटे की शादी में दिल खोल कर मांगने वाले ही बेटी की शादी में दहेज़ के कट्टर विरोधी हो जाते है. Hindu Succession (Amendment)Act, 2005 के अनुसार पेअत्रक सम्पति में महिला की बराबर हिसेदारी है. दहेज़ के बजाय स्त्रीधन की अवधारणा को वापस लाया जाए.

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 4, 2012

    चलिए, आपका यह सुझाव स्वीकार करने योग्य है क्योंकि यहाँ दहेज़ प्रबंधन की कोई मज़बूरी तो नहीं.. यह पूरी तरह से अभिभावक के आर्थिक स्तर पर निर्भर करेगा पर उनका क्या जिनके पास पैत्रिक संपत्ति के नाम पर कुछ भी नहीं ?

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
January 4, 2012

मैंने बेबाकी से उसका “दाम” पूछ लिया तो उसने उतनी ही बेबाकी के साथ 10 -15 लाख का हिसाब-किताब दिखा दिया | दुसरे लड़के को उसकी आर्थिक स्थिति से कोई मतलब नहीं था | मैंने इश्वर को धन्यवाद दिया पर दूसरे ही पल उसने लड़की का मोबाईल नंबर मंगाते हुए कहा कि अभी एक डेढ़ साल विवाह कि कोई योजना नहीं है |.. रजनी जी ऐसे बहुत कुछ दृश्य देखने सुनने को मिलते हैं …सच मानो तो जोडियाँ भाग्य से बनती हैं …कितना भी कोई खोजे जूझे ..पचासों तलाशे जाते हैं और रफा दफा …बेकार अच्छे हो जाते हैं और बड़े बड़े घर के तथा कथित हीरे कांच बन जाते हमने देखा है …. सब कुछ अच्छा हो मुबारक …सुन्दर लेख भ्रमर ५

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 4, 2012

    सही है सुरेंदर जी, जब सही समय आता है तभी कहीं बात बन पाती है..लेकिन इसके पीछे भाग्य की लिखावट से ज्यादा अभिभावकों की क्षमता व् उर्जा काम आती है .

January 4, 2012

इंसान अपने दो हाथों का भरसक उपयोग करता है विवाहादि में. एक हाथ से लेता है, दुसरे से देता है. भले ही हम दहेज़ लेना बंद भी कर दें, तो भी देना बंद नहीं करते. नतीजा, ये दानव नष्ट नहीं हो पाता. सब अपना उत्तरदायित्व समझें, तो ही कुछ भला हो. अन्यथा, ऐसे ही चलने वाला है. सार्थक प्रस्तुति, बधाई. सादर.

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 4, 2012

    सही कहा, ऐसे किसी एक बन्दे को सामने ढूँढना मुश्किल है जिसे इस उत्तरदायित्व की समझ हो..

abodhbaalak के द्वारा
January 4, 2012

रजनी जी सराहनीय लेख, आपने पुराने समय से कही गयी बात को काटने का अच्छा प्रयास किया है. ऐसे ही लिखते रहें http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 4, 2012

    हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद अबोध जी

manoranjanthakur के द्वारा
January 4, 2012

बेबाक और सुंदर रचना बधाई

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 4, 2012

    प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद मनोरजन जी.

kiran Jha के द्वारा
January 4, 2012

धन्यवाद रजनी जी, लगता है इस मामले में आपने अच्छा खासा रिसर्च कर लिया..

    Rajni Thakur के द्वारा
    January 4, 2012

    और इस तरह एक नया अनुभव भी मिल गया.


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