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बाल दिवस पर..

पोस्टेड ओन: 10 Nov, 2011 जनरल डब्बा में

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जूठे बर्तनों की ढेर से
निपटती वो नन्हीं उंगलियाँ
ढाबे की चहल पहल में दबी
कई बचपने की सिसकियाँ
images[5]
कभी पानी तो कभी चाय का
ग्लास लिए भागा आता है ,
कभी खाने की थाली के संग
मायूस बालपन परोस जाता है |
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ग्राहकों की नजरें टटोलती
अपनेपन की चाह तक ,
कुछ खबर नहीं खुद की
भोर से देर रात तक |

(तस्वीरें नेट से साभार )

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
November 12, 2011

रजनी जी ,.सादर अभिवादन बहुत अच्छी अभिव्यक्ति ,…हम अपने चारों तरफ देख कर अनजान ही बने रहते हैं ….हार्दिक साधुवाद

    RajniThakur के द्वारा
    November 12, 2011

    प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद संतोष जी .

Durgesh के द्वारा
November 12, 2011

बाह, प्रसंसनीय! क्या बिचार हैं आपके. बल दिवस पर आपने सही चित्रांकन किया है. आप अच्छी कविता लिखतीं हैं.

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 12, 2011

    कविता अच्छी लगी तो मेरा यह प्रयास भी सार्थक हुआ, धन्यवाद.

Abdul Rashid के द्वारा
November 12, 2011

कटु सत्य http://singrauli.jagranjunction.com

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 12, 2011

    ..और मार्मिक भी.

minujha के द्वारा
November 11, 2011

सच्चाई  उकेरती एक सुंदर कविता

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 12, 2011

    धन्यवाद मीनूजी..

Amar Singh के द्वारा
November 11, 2011

एक कटु सत्य को बहुत ही सुन्दर तरीके से पेश किया है बहुत बधाई. http://singh.jagranjunction.com

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 11, 2011

    प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद अमरजी.

alkargupta1 के द्वारा
November 11, 2011

इन मासूमों के बचपन की कहानी शुरू होने से पहले ही इनकी सिसकियों में ख़त्म हो जाती है…..भावपूर्ण रचना रजनी जी .

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 11, 2011

    आपको पसंद आई, बेहद धन्यवाद अल्काजी.

abodhbaalak के द्वारा
November 11, 2011

ह्म्मम्म्म्मम्म्म्म कितने महीनो के बाद आपका मंच पर आना हुआ रजनी जी? वेलकम बैक. मर्म्स्पर्शीय रचना, और वैसे ही चित्रों के साथ………. ये हमारी दोहरी मानसकिता है की हम केवल कहने को तो बल श्रम को हटाने की बात …….. आशा है की आप अब अगले पोस्ट के लिए इनता न्समय नहीं लेंगी http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 11, 2011

    सही कहा अबोधजी, एक तरफ तो हम बाल श्रम हटाने की बात तो करते हैं पर दूसरी तरफ उन्हें अपने घरों में नौकर बनाने से परहेज नहीं करते |

akraktale के द्वारा
November 10, 2011

रजनी जी सिर्फ बाल दिवस पर ही क्यों ये मासूम मजबूर बच्चे हमें याद आते हैं? फिर वर्ष भर इनकी पीड़ा को क्यों हम भूल जाते हैं. सिर्फ सरकार ही नहीं पुरे समाज का कर्तव्य है इन्हें शिक्षित करना. क्योंकि यही कल का भारत हैं. आपने अपनी रचना में भी फिर वही पुरानी बात लिखी है जिसे हम सब जानते हैं.मगर करते कुछ नहीं है.

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 11, 2011

    ऐसा नहीं है..बाल दिवस हमारे द्वारा किये गए प्रयासों का मूल्यांकन करता है कि आखिर वर्षभर हमने इनके लिए क्या किया.. कोई भी बात या समस्या तब तक पुरानी नहीं होती जब तक उसका पूर्ण समाधान हमें नहीं मिल जाता. सबसे बड़ी बात यह कि प्रयास तभी नजर में आते हैं जब सकारात्मक परिणाम सामने आये.

shashibhushan1959 के द्वारा
November 10, 2011

रजनी जी, द्रवित कर देने वाली रचना. शब्द चयन भी उत्तम. बधाई.

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 11, 2011

    धन्यवाद शशिभूषण जी.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 10, 2011

मजदूरी करने वाले बच्चे फिर चाहे वो किसी दुकान मे हो या किसी मकान मे …….. इनके उत्थान के लिए किसी सरकार ने कुछ नहीं किया….. गरीबी ही इसका मुख्य कारण है….. मुफ्त शिक्षा देने या दिन मे एक बार खाना देने से इनका हित नहीं होगा….. तब तक कोई लाभ नहीं जब तक इन्हें एक मजबूत आधार और उज्जवल भविष्य का भरोसा न दे दिया जाए……

    Rajni Thakur के द्वारा
    November 11, 2011

    सही कहा आपने पियूष जी, ऐसे बच्चों के हितार्थ योजनायें तो हैं पर उनसे इनकी मुलभुत समस्या पर खास फर्क नहीं पड़ता .




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