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मैं कौन..?(इन द वर्ल्ड ऑफ़ थर्ड जेंडर)

Posted On: 24 Feb, 2011 Others में

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अपराजित उर्जा के संग
रोज़ नए संसार गढ़ती हूँ
विरक्त, बंजर धरणी मैं
तील तील हरपल मरती हूँ.
——————————-
विधाता का श्राप हूँ, पर
शगुन की प्रतिमूर्ति हूँ
सबकी बलाएँ हरती मैं
बिना मांग की पूर्ति हूँ.

——————————
समाज के हाशिये पर
दरकिनार खड़ी हूँ लेकिन
परित्यक्तों को छांह देती
मैं विशाल वटवृक्ष हूँ .
——————————
यूँ न दुत्कारो मुझको
मैं भी तो इंसान ही हूँ
स्वयं अबूझ पहेली,पर
प्राण-आत्मवान हूँ.

—————————–
220px-Kuvagam_hijras[1]

—————————–
समाज का कलंक नहीं
बिम्ब हूँ मैं उसका ही
ओढ़े रखूं मुखौटा तो
लगती है ये दुनिया सही.
—————————-
व्यंग्य या पाशविकता
धिक्कार या उपहास
नज़रों में कभी नयापन दो
जीने का हक़ मुझे भी दो
.
—————————–
काश थोडा आशीष बचा लें
हम अपने भी आँचल में !
सांसों की जब डोर टूटे
कोई अपना हो आँखों में.
—————————–

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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

aditya के द्वारा
April 13, 2011

रजनी जी, आपकी कविता, पोस्ट होने के लगभग डेढ़ महीने के बाद, पढ़ रहा हूँ इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ मै इस दौरान ब्लॉग से दूर रहा यही कारण रहा है………….. आपकी कविता ने मुझे असमंजस में डाल दिया, कि प्रतिक्रिया देते समय क्या लिखू, क्योंकि कविता की विधा के अनुसार( कवित्त के दृष्टिकोण से) ये एक अति उत्तम कविता है……………. और ये उन तीसरी नस्ल वालो के मार्मिक वेदना को दर्शाती है, जो असहाय हैं……………… किन्तु इन्ही तीसरी नस्ल वालो के बीच में छुपे लुटेरो के विषय में आप क्या कहेंगी………….. शायद आप खुद नहीं जानती होंगी…….. कृपया मेरी पोस्ट “हिजड़ों द्वारा बधाई या आतंक……….फैसला आपका” पढने का कष्ट करें…….. शायद मेरी असमंजस का कारण मिल जायेगा……….. खैर………………… कविता बहुत ही उत्तम है, शब्द संयोजन अति उत्तम………….. बधाई स्वीकारें ! आदित्य http://www.aditya.jagranjunction.com

    Rajni Thakur के द्वारा
    April 13, 2011

    आदित्य जी, आपका असमंजस अपनी जगह सही है..मैंने भी ऐसी कई अप्रिय स्थितियों का सामना किया है..पर वह शाश्वत सवाल अपनी जगह खड़ा है कि जैसे आम इंसानों के लिए काम कि कोई कमी नहीं,फिर इन्हें क्यों एक विशेष वर्ग में विभाजित करके रख दिया समाज ने ? इनके पास भी तो हमारी ही तरह मानसिक- शारीरिक क्षमताएँ हैं फिर ये भेदभाव कैसा..?

abodhbaalak के द्वारा
March 31, 2011

बार बार पढ़ी जाने वाली रचना रजनी जी शब्द कम पड़ रहे हैं……………… ऐसे ही लिखती रहें

    Rajni Thakur के द्वारा
    April 13, 2011

    बहुत धन्यवाद अबोध जी,हौसला अफजाई के लिए..

nikhil के द्वारा
March 2, 2011

व्यंग्य या पाशविकता धिक्कार या उपहास नज़रों में कभी नयापन दो जीने का हक़ मुझे भी दो… रजनी जी बहुत गंभीर ..और अर्थपूर्ण रचना है.. आपकी बहुत बारीक दृष्टि को दर्शाती रचना ..

    Rajni Thakur के द्वारा
    April 13, 2011

    धन्यवाद निखिल जी, प्रतिक्रिया देकर मेरा हौसला बढ़ने के लिए.

shuklabhramar5 के द्वारा
February 26, 2011

समाज का कलंक नहीं बिम्ब हूँ मैं उसका ही ओढ़े रखूं मुखौटा तो लगती है ये दुनिया सही. रजनी जी आप का ये पात्र -चित्रण -मर्म- बहुत ही संवेदनशील, हृदयस्पर्शी है मन इसे बार -बार पढने को करता है -हर कड़ी अपने में लाजबाब है – हम इस तरह कि रचनाओं कि उम्मीद आप से लगाये बैठे हैं .. शुक्लाभ्रमर कृतियों कि कड़ियाँ ….नारी-पतंग-पगली-कोयला

    RajniThakur के द्वारा
    February 27, 2011

    प्रतिक्रिया हेतु धन्यवाद भ्रमर जी.

rajkamal के द्वारा
February 25, 2011

रजनी जी ….. नमस्कार ! अपराजित उर्जा के संग रोज़ नए संसार गढ़ती हूँ विरक्त, बंजर धरणी मैं \’तिल – तिल\’ हरपल मरती हूँ. शायद ही किसी ने उनके बारे में सोचा होगा आपने कविता लिख कर उनकी तरफ सभी का ध्यान खींचा है ….. स्राह्नायोग्य प्रयास

    RajniThakur के द्वारा
    February 26, 2011

    राजकमल जी, आपकी प्रतिक्रिया देखकर बेहद प्रसन्नता हुई .यूँ ही आशीर्वाद बनायें रखे.

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    धन्यवाद अतुल जी

pallavi के द्वारा
February 25, 2011

bahut dil chhune वाली रचना…aise hi likhti rahe..

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    Thanks a lot…Pallavi.

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 25, 2011

रजनी जी, बहुत भावुक करदेने वाली रचना…आपके द्वारा पोस्ट किया गया चित्र बहुत कुछ कह जाता है.. मै आपकी कविता के लिए दो शब्द कहना चाहूँगा….. ****************************************************** इनकी पथराई आँखों ने क्या नहीं दुःख उठाया है, पूंछो तो ऐ दुनिया वालों मत सोचो की वो पराया है.. ****************************************************** आकाश तिवारी

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    bahut dhanyavad aakash bhai, aapki do panktiya mere post ko purn karti hai.

rachna varma के द्वारा
February 25, 2011

ओह , बहुत ही संवेदनशील मुद्दे को आपने उठाया ये सचमुच समाज से कटे हुए लोग है इनकी पीड़ा को समझना उसे अपनी कलम के जरिये एक नया जीवन देने की कोशिश करना , बिरले लोग ही कर पाते है ऐसा उसके लिए आपको साधुवाद ! आपकी कलम इतनी ही सशक्त बनी रहे |

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    रचना जी, मेरा कलम सार्थक हो जायेगा जब हम जैसे लोगों की नज़र में उनके लिए धिक्कार न होकर संवेदना उपजेगी. वो अपने पेशे को ही लेकर ‘समाज की गन्दगी’ कहलाते हैं न ?..तो उन्हें इस पेशे के लिए मजबूर किसने किया? aapki pratham pratikriya के लिए bahut dhanyavad रचना जी..

mithilesh dubey के द्वारा
February 25, 2011

गहरे सवेंदना समेटे लाजवाब प्रस्तुति . http://mithilesh.jagranjunction.com

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    बहुत धन्यवाद मिथिलेश जी.

Alka Gupta के द्वारा
February 25, 2011

रजनी जी , समाज में रहते हुए भी ये समाज के अंग नहीं है कुछ अनुत्तरित प्रश्नों के साथ इनके प्रति संवेदना व्यक्त करती हुई अति सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना !

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    प्रिय अलका जी, जानवरों जैसी स्थिति है हाड़-मांस के इन इंसानों की ..भला क्यों? कहने को हमारा समाज नई सदी के स्वागत को तत्पर दिखाई दे रहा है जहाँ ‘लिव इन रिलेसन या गे रिलेशन’ को भी मान्यता मिल चुकी है तो फिर इन्हें एक सम्मानजनक व्यवसाय देने में क्या परेशानी है हमारे समाज को ?

jeetrohann के द्वारा
February 25, 2011

बहुत अच्छी रचना है. malkeet singh jeet “fursat ke din” http://jeetrohann.jagranjunction.com/

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    रोहन जी, प्रतिक्रिया हेतु बहुत धन्यवाद.

div81 के द्वारा
February 25, 2011

सामाजिक होते हुए भी मुख्धारा से कटे हुए इन लोगो के लिए बहुत ही मार्मिक रचना प्रस्तुत की आपने एक संवेदनशील रचना.के लिए हार्दिक बधाई………

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    दिव्या जी ,कहने को वो सामाजिक हैं, लेकिन ये कैसी मज़बूरी है कि उन्हें मुख्यधारा से पृथक अपना अलग समाज बनाना और स्वीकारना पड़ता है ? उनके बारे में सोचती हूँ तो व्यथा होती है..जिनपर गुज़रती होगी उनका क्या..? …प्रतिक्रिया देकर मेरा हौसला बढ़ने के लिए बहुत आभारी हूँ..

deepak pandey के द्वारा
February 25, 2011

रजनी जी, एक संवेदनशील रचना.

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    दीपक जी, धन्यवाद ..रचना में संवेदनशीलता स्वयं आ जाती है जब पात्र की इतनी मार्मिक दशा हो …

Harish Bhatt के द्वारा
February 25, 2011

रजनी जी नमस्ते.. बहुत ही बेहतरीन और दिल को छू जाने वाली रचना के लिए हार्दिक बधाई.

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    हरीश जी, अत्यंत धन्यवाद, प्रतिक्रिया देकर मेरा हौसला बढ़ने के लिए..

nishamittal के द्वारा
February 25, 2011

एक मर्मस्पर्शी ,संवेदनशील रचना साथ ही भाव पूर्ण.

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    प्रिय निशाजी, व्यस्तताओं के बावजूद आपने प्रतिक्रिया दी, आभारी हूँ..

vinitashukla के द्वारा
February 25, 2011

सुन्दर और मार्मिक कविता के लिए बधाई रजनी जी.

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    बहुत धन्यवाद विनीता जी.

nikhil के द्वारा
February 25, 2011

अच्छी कविता रजनी जी. आभार, निखिल झा

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    निखिल जी, बहुत बहुत धन्यवाद…

Ramesh bajpai के द्वारा
February 25, 2011

रजनी जी स्वयं अबूझ पहेली,पर प्राण-आत्मवान हूँ. क्या बात है ,अति सुन्दर

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    रमेश जी, कविता पसंद आई तो मेरा प्रयास सार्थक रहा, समय निकलकर प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद .

priyasingh के द्वारा
February 24, 2011

मन को झकझोर देने वाले कई प्रश्न मन के सामने खड़े होगये आपकी कविता पढ़ते ही ……..लेकिन उन प्रश्नों के सामने मै निरुत्तर हूँ……….हमारा समाज ऐसी कई विवशताओं से भरा हुआ है जिनके सामने हम अपने आपको विवश पाते है ……… मर्मस्पर्शी कविता…….

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    प्रिया जी, प्रतिक्रिया हेतु आभार देना चाहूंगी..क्योंकि नए नए विषय-वास्तु को छूने की प्रेरणा यहीं से मिलती है.बहुत धन्यवाद.

rajeev dubey के द्वारा
February 24, 2011

जैविक संरचना के एक अनसुलझे सामाजिक रूप और हाशिये पर खड़े इन लोगों के प्रति आपकी संवेदना व्यक्त करती रचना कठिन प्रश्नों को खड़ा करती है ….समाज के पास नहीं है उत्तर आज तो ..

    RajniThakur के द्वारा
    February 25, 2011

    राजीव जी, मुझे इस बात की अत्यंत प्रशन्नता हो रही है आपने रचना के मर्म को समझा…इस पहेली को आसन बनाने के लिए मैं रचना का शीर्षक :मैं कौन: से बदलकर :द वर्ल्ड ऑफ़ थर्ड जेंडर :कर रही हूँ…प्रतिक्रिया हेतु आभार.

jeet abhishek के द्वारा
February 24, 2011

रजनी जी, काफी प्रभावी पंक्तियाँ हैं, विषय-वास्तु नारी से प्रभावित है पर image ..?

    RajniThakur के द्वारा
    February 24, 2011

    अभिषेक जी, रचना भी image से ही सम्बंधित है..प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.

shuklabhramar5 के द्वारा
February 24, 2011

रजनी जी क्या गजब की प्रस्तुति है . .नारी हमारी जननी है – दोस्त है -बहन है -माँ है – फिर भी ये समाज क्या कहना इसके पढ़े लिखे सभ्य लोगों को .. बहुत अच्छा शब्दों का संयोजन समाज के हाशिये पर दरकिनार खड़ी हूँ लेकिन परित्यक्तों को छांह देती मैं विशाल वटवृक्ष हूँ . मेरी शुभ कामनाएं ..जारी रखिये … शुक्लाभ्रमर५

    Rajni Thakur के द्वारा
    February 24, 2011

    भ्रमर जी, मेरे पोस्ट पर आपकी प्रथम प्रतिक्रिया देखकर हर्ष हुआ..बहुत धन्यवाद.

वाहिद काशीवासी के द्वारा
February 24, 2011

वाह रजनी जी, सुन्दर एवं अप्रतिम भावनाओं को संप्रेषित किया है आपने| बहुत अच्छे..

    Rajni Thakur के द्वारा
    February 24, 2011

    वाहिद भाई, हमेशा की तरह प्रतिक्रिया देकर मुझे प्रोत्साहित करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

rita singh'sarjana' के द्वारा
February 24, 2011

रजनी जी काश थोडा आशीष बचा लें हम अपने भी आँचल में ! सांसों की जब डोर टूटे कोई अपना हो आँखों में. अच्छी कविता प्रेषित करने के लिए बधाई —————————–

    Rajni Thakur के द्वारा
    February 24, 2011

    प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद रीता जी.


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