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29 Posts

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rajnithakur


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सीमा तय करेंगे ये…?! Jagran Junction Forum

Posted On: 14 Jul, 2012  
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जनरल डब्बा मेट्रो लाइफ में

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क्यों पापा..? Jagran Junction Forum

Posted On: 11 Jul, 2012  
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जनरल डब्बा में

44 Comments

ऐसे बनेगा भाग्य ?

Posted On: 17 Jun, 2012  
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जनरल डब्बा में

18 Comments

यहीं तय होती हैं जोड़ियाँ

Posted On: 4 Jan, 2012  
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जनरल डब्बा में

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बाल दिवस पर..

Posted On: 10 Nov, 2011  
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जनरल डब्बा में

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कुछ तो खबर हो !!

Posted On: 13 Apr, 2011  
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जनरल डब्बा में

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एक समग्र हिंदी फ़िल्मी वेबसाईट

Posted On: 11 Apr, 2011  
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जनरल डब्बा में

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मैं कौन..?(इन द वर्ल्ड ऑफ़ थर्ड जेंडर)

Posted On: 24 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

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संस्कारों में छुपी ग्रहों की शुभता

Posted On: 19 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

17 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय रजनी जी, नमस्कार सबसे पहले एक विचारणीय मुद्दे को उठाने के लिए बधाई फिर मैं आपके लेख को पढने के बाद एक ही बात कहना चाहूँगा .......... आज वर्तमान परिस्तिथियों में पहले वाली बात नहीं रही की आप यह कह सकें की लड़कियों ने पुरुष से आगे निकलने की ठान ली है या वो ऐसा कुछ सोचती भी हैं .........यदि आप यह कह रही है तो आप उन्हें अल्पविकसित घोषित कर रही हैं........जबकि आज की नारी आगे बढ़ने की सोचती है अपने वजूद के लिए जिसके लिए कोई भी संघर्ष करता है इसे किसी स्पर्धा के तौर पर नहीं देखा जा सकता देश में रेप और शोषण की घटनाएं ऐसी नहीं है की बढ़ गई है ........हाँ यह जरुर है की अब दिखने लगी है पहले दिखती नहीं थी.........हमें दुःख तो होना ही चाहिए किन्तु यह भी देखना चाहिए की अब ऐसे घटनाओं के खिलाफ आवाजे भी उठ रही है ........आगे स्थिथि में परिवर्तन अवस्य होगा सुन्दर लेखनी के लिउए पुनः बधाई

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

रजनी जी ,ये सही है कि परिवार एक दुसरे के विरोध में खड़े होकर नहीं अपितु सहयोग से ही चल सकता है,यही नियम समाज पर लागू होता है,समाज में विकृत मानसिकता बढ़ने के कारण,आज कोई भी सुरक्षित नहीं दिखाई देता यही कारण है कि कभी गुवाहाटी का केस सामने आता है,तो कभी दिल्ली का और अधिकांश तो ऐसे भी होते हैं,जो या तो स्वयं भी मौन हो कर अपने ऊपर अत्याचार सहती हैं,या फिर उनके माता-पिता बेटी की शादी नहीं होगी ,मामले को दबाते हैं.यहाँ तक कि अबोध बालिकाएं भी परिवार के सदस्यों के द्वारा तथा शिक्षकों के द्वारा भी शोषित होती हैं,परन्तु इसका अर्थ ये तो नहीं कि सभी रिश्ते दागदार हैं बेटी को सर्वसुख प्रदान करने की भावना जहाँ पिता या पितृ तुल्य अन्य रिश्तों में होती है,तो भाई अपनी बहिन की रक्षा के लिए प्राणों पर खेल जाते हैं.पति ,पुत्र ,सभी अपने अपने रिश्तों के अनुसार दायित्व निभाते हैं. आपके शीर्षक के कारण कुछ बुरा लगा है जिसको देने का कारण हाल में घटित घटनाओं के प्रति आपका आक्रोश है,परन्तु सभी को एक तराजू में नहीं तोला जा सकता.हाँ दोषी चाहे जो भी उसको कड़ी से कड़ी सजा मिलनी CHAAHIYE.

के द्वारा: nishamittal nishamittal

शशिभूषण जी, यकीन मानिये इस रचना का यह शीर्षक रखने के पीछे पुरुष या पिता को वहशी दरिन्दे शब्द से संबोधित करना मेरा उद्देश्य कतई नहीं था और यह संभव भी नहीं था क्योंकि मेरे पिता और भाई भी पुरुष ही हैं ! ..उस समय पिछली रात को घटित गोवाहाटी वाली घटना मेरे दिमाग छाई हुई थी. मेरा आशय यह था कि लड़कियों को सरेआम बेइज्जत करने वाले इन दरिंदों को यह अधिकार किसने दिया कि ये बहु बेटियों कि सीमाएं तय करते फिरें !! इसीलिए इस घटना का जिक्र मैंने अपने आलेख में भी किया है . साथ ही आप मेरी उस पंक्ति पर भी ध्यान आकृष्ट करने कि कृपा करें जिसमें मैंने ऐसे हालातों से लाख गुना बेहतर उस स्थिति को माना है जब बेटियां अभिभावकों के सख्त अनुशासन में रहती हैं.. "इन सवालों से परेशां मन में एक ख्याल यह भी आता है कि इस दुर्दशा के सामने माता पिता का सख्त अनुशासन लाख गुना बेहतर है ! अनुशासन की सीमाओं के अन्दर कम से कम बेटियों के वजूद और आत्म सम्मान की धज्जियाँ तो नहीं उडेंगी !" ..सम्पूर्ण पुरुष समाज नहीं बल्कि मैंने उन पुरुषों को कटघरे में रखा है जो बेखौफ मोरल पुलिस बनाकर गोवाहाटी जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं और अभिभावकों को अपने फैसले पर पुनः विचार करने को बाध्य कर देते हैं... शशिभूषण जी, ऐसी रचनाओं की बाढ़ तो अभी आएगी ही, जागरण जंक्शन फोरम ने जब बेटियों की स्थिति पर सबकी राय मांगी है तो अपनी अपनी बात कहने का अधिकार तो है न हमें ?

के द्वारा:

आदरणीय रजनी जी, सादर ! बहुत उग्र आलेख ! समाज के एक अंग के प्रति, जीवन-रथ के एक पहिये के प्रति, यानी पुरुष के प्रति आक्रोश से भरी रचना ! पितृसत्तात्मक व्यवस्था और पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था का मुखर विरोध आपकी रचना में स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है ! ऐसी रचनाओं की बाढ़ सी आई हुई है ! ""सीमा तय करेंगे ये वहशी-दरिन्दे ?"" यानी सीमा तय करेंगे ये पुरुष या पिता ? मैं नहीं जानता ऐसा लिखने के पीछे आपका क्रोधातिरेक है या पुरुष विरोधी मानसिकता, पर सम्पूर्ण पुरुष समाज को जो आपने कठघरे में खडा कर दिया है ! जबकि अपराधी कुछ ही हैं ! इसी पुरुष समाज में पिता, भाई, चाचा, मामा या अन्य-अनेक आते हैं ! और ऐसा भी नहीं है की अपराधी केवल पुरुषों में ही हैं, भंवरी देवी, सन्नी लिओन जैसी अनेक नारियां भी हैं, जिनके कृत्यों का कदापि समर्थन नहीं किया जा सकता और जो इन व्यभिचारी और बलात्कारी पुरुषों की श्रेणी में ही रखे जाने योग्य हैं ! रजनी जी, अगर परिवार के दो हिस्से कर दिए जायं, एक हिस्सा पुरुषों के लिए और एक हिस्सा स्त्रियों के लिए, और सबके रास्ते अपने-अपने हों, सभी अपने-अपने हिसाब से अपना जीवन जियें, कमायें-खाएं-उड़ायें..... क्या ये आपकी नजर में बेहतर होगा ! परिवार एक छोटा सा समूह है ! इन्हीं परिवारों का एक बड़ा समूह समाज है ! किसी भी समूह का नेतृत्व किसी एक के हाथ में होना चाहिए ! वह स्त्री हो या पुरुष, उससे कोई मतलब नहीं ! बहुत से परिवारों का नेतृत्व महिलायें ही करती हैं ! परिवार का मुखिया हमेशा अपने परिवार की सुरक्षा और बेहतरी के लिए सजग रहता है ! ऐसी उग्र बातें इतने कडवे तरीके से लिखने के पूर्व हम सभी को एक बार पुनः सोचना चाहिए ! (मैं अपनी बातें आपका विरोध करने के लिए नहीं लिख रहा हूँ ! फिर भी मेरी किसी बात से आपको कष्ट हो तो मैं क्षमा प्रार्थी हूँ ! )

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

माबाप का हक्क और जिम्मेदारी होती है की अपने बच्चों का ध्यान रख्खे और अनूशासन की डोर मजबूती से पकडे रख्खे । समाजद्रोहीयों ने वो डोर कमजोर कर दी या तोड दी, बच्चों की आजादी के नाम पर । बच्चे माबाप को पूछ ने भी नही रहते वो कहां जाते हैं, क्या करने जा रहे हैं । बस अपने आप उड निकलते है । गिरते हैं तो कभी शराब के अड्डे पर, कभी रेव पार्टी द्वारा पूलिस की गाडी में या गलत जगह पर गीर के अपने शरीर का बलात्कार करवा लेते है । और कभी अपना अपहरण या खून भी करवा लेता है । माबाप को अगर पूछता तो वो अपने अनूभव से बता सकते हैं बच्चे, समय या जगह जाने लायक नही है । बच्चे माबाप के हाथमें नही रहे । किस का कसुर है ? भारत का सबकुछ ढिला करने की चाह रखने वाले देशद्रोहियों का । वो चाहते हैं की अमरिका जैसा समाज यहां भी हो जाये । वहां बच्चे को उस का बाप थप्पड भी मारता है तो पूलिस बाप को उठा ले जाती है । बच्चे ईतने आजाद हो गये हैं की अपनी चीजों मे कोंडोम भी रखने लगे हैं । वहां भारत की तुलना में बलात्कार का प्रमाण शायद कम होगा । लेकिन आदमी अच्छे है ईस लिए नही, बल्के ईसलिए की वहा अपने आस पास सेक्स आसानीसे मिल जाता है । “आती है क्या खंडाला” कहनेवाला चप्पल नही खाता । या तो उस का काम बन जाता है या “नोट नाउ” जैसी मुस्कान ही पाता है । आदमी को कोइ जरूरत नही बलात्कार करने की । फ्री सेक्स है भाई, एकने मना किया तो दुसरी को पूछते हैं, “आती है क्या खंडाला” । भारत में कौन से माबाप चाहेंगे की उनका बेटा ऐसा वाक्य बोले या उन की बेटी पहली या दूसरी बन के ये वाक्य सुन ले । वो तो चप्पल मारना ही सिखायेंगे । लेकिन चप्पल या जुते मारना माबाप को खूद सिखना होगा । उनको जुते चप्पल मारने होंगे जो भारत के सामाजिक ढांचे को तोड रहे हैं ।

के द्वारा: bharodiya bharodiya

आजकल बेटियों को गुमराह किया जा रहा है । तूझे तो तेरे माबाप बोज समजते हैं । तूझे दुसरों के घर भेज देना चाहते हैं, जहां तूझे एक बहु के रूपमें गुलाम बन के रहना है । कम अकल लडकी तो बहक जायेगी । विद्रोही बन जायेगी । पुरुष जात से नफरत करने लगेगी, और शादी करने से ही ईन्कार करेगी । समजदार लडकी बहक नही जाती । वो जानती है उस का अंतिम लक्ष सेक्स, बच्चे और घर परिवार ही है । जीस के लिये उसे दुसरे घर जाना तो पडेगा ही । अगर कोइ लडकी पढ लिख कर खूद कमाना जानती है तो सिर्फ अपने लिए नही कमाती है । अपने बच्चों के लिए, अपने परिवार के लिए कमाती है । अगर कोइ लडकी के माबाप लडका देखने में देर करते हैं तो लडकी खूद ढुंढ लेती है, कटी पतंग बन जाती है । माबाप से नाता तोड भाग कर शादी कर लेती है । ये बहुत बडा सबूत है की लडकियों को कितनी चाह होती है दुसरे घर जाने की । उसे कोइ कोई दुःख नही है । दुःख सिर्फ उन सरफिरों को लगता है जो ऐसी बहस चलवाता है की “बेटी पराई है” । “बेटी पराई है” जैसे भावनात्मक शब्दों पर समाज नही चलता । कोइ लडकी अपने से छोटी उमर की सहेली की शादी में जाती है तो असहज हो जाती है । पूछनेवालों का भी डर सताता रहता है, ”तेरी कब बारी है ?” घर आने पर उदास हो जाती है । लडकेवाले उसे नापसंद करते हैं या वो लडके को ना पसंद करती है तो उस घटना को सहना मुश्किल होता है । पढी लिखी लडकियों की अकल भी आजकल ठिकाने पर आ रही है । सही लडके को कोइ घरेलु लडकी उडा ना ले जाये ईस लिए वो भी जल्दी कर रही है । लडकियों की बात सही है । देर करनें मे नखरेवाले लडके ही बचते है, या निकम्में बचते हैं । किधर टिकपाती है “बेटी पराई है” वाली बात ?

के द्वारा: bharodiya bharodiya

रजनी जी इस गोहाटी की घटना को आपके सामने मैं स्वयं भी रखने जा रहा था. इसकारण से ही पुनः आपकी इस पोस्ट पर आया भी हूँ...देखा आपने स्वयं ही इस घटना को संज्ञान में लिया है...ऐसी घटनाएँ प्रतिदिन घटती हैं.. हर क्षेत्र में होती हैं..बहुत सारी घटनाओं को दबा दिया जाता है...जिनके परिवार में ऐसी घटना हो जाती है उन पर क्या गुजरती होगी आप समझ सकती हैं...कितना शर्मसार होना होता होगा...उफ़... समय बदला, समाज बदला, विकास हुआ लेकिन व्यक्ति कि मानसिकता दूषित होती गयी...नैतिक पतन होता जा रहा है..इंसान हैवान होता जा रहा है... आखिर एक पिता अपनी बेटी को लेकर क्यों ना चिंतित हो..कैसे अकेली छोड़ दे इन दरिंदों के बीच... वह भी तो चाहता है कि उसकी बेटी आगे बढे..उन्नति करे..स्वाबलंबी हो..खुशहाल रहे... लेकिन....

के द्वारा: Ajay Kumar Dubey Ajay Kumar Dubey

के द्वारा: deepaksharmakuluvi deepaksharmakuluvi

के द्वारा: Chandan rai Chandan rai

के द्वारा: VIVEK KUMAR SINGH VIVEK KUMAR SINGH

रजनी जी यह एक विषय जिस पर में शोध करना चाहता था | दहेज़ , दानव, और मांगने वाले को कई सींग और नाखुनो वाला मुहं में खून लगा लड़के को बेचने वाला जल्लाद होता है | अब हर घर में लड़के लड़की दोनों होते हैं दोनों की शादी होती है और दोनों वक़्त लेन देन होता है | पता नहीं कि कब एक ही व्यक्ति लड़की माँ बाप होते कुलीन और संस्कारित हो जाते हैं और कब लड़के शादी में राक्षसी | मेरे कुछ कथनों पर मेरी खुद की पत्नी भड़क जाती जब में कहता की लड़की के असली दुश्मन उसके माँ बाप है जोकि उसके असली हक जिसे जीतेन्द्र कुमार भारती Hindu Succession Act कहा को , कभी नहीं देते | मेरी एक analysis यह है कि एक परिवार जसमें एक लड़का लड़की है उसमे लड़की को दहेज़ में कितना ही दिया जाये (वह भी खूब कोस कोस कर) वह भी लड़के के हिस्से में आयी जमीन मकान fixed assets का कुछ प्रतिशत भी नहीं होता | पर यह सब देते वक़्त इतना हो हल्ला दयनीयता का माहोल बना दिया जाता है कि आज जो लड़की किसी परिवार में बहु बनके अपना स्थान बनाने वाली है पहले से ही उस घर लिए विष से भरी भावना लेकर जाता है | मैंने अपनी बहनों कि शादी के वक़्त माँ को हमेशा मन किया कि वे भावी पति या उस के घरवालों को यह कहकर न कोसे कि इतना खर्च करवा रहें हैं \ और हिसाब लगाकर बताया कि आप जो लडको के लिए अपनी सम्पति से छोड़कर जाओगे वह कई गुना ज्यादा है | आज भी रस्म रिवाजों तहत बहनों को या उनके परिवार विभिन्न उपलक्ष में कुछ देना हो तो में हमेशा यही मानता हूँ उनका बाकी बहुत बचा वाही किश्तों में प्यार व सम्मान से दे रहा हूँ | हाँ जिन परिवारों कि आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब वहां उनकी कुल सम्पति से ज्यादा का लेन देन हो तो काफी शोचनीय | प्रश्न वहीँ आकर खड़ा हो जाता है क्या सभी लड़किओं को अपने माँ बाप से उनकी संपत्ति कुछमिल पता है पर उसको घुमा इस तरह दिया जाता है कि शादी के समय दिया जाने वाला धन व सामान दहेज़ बना दिया जाता है | कुछ बुजुर्ग जिनका सारा जीवन दर्शन ही व्यापारिक हो उन्हें कहते सुना है कि लड़की लड़के से कम पैसे खर्च कराती है एक बार शादी में लगा दो तो जिंदगी भर का एहसान उतर जाता है | एक और जुमला एक बहुत ही घिसे हुए बुजुर्ग से सुनने को मिला अरे हम तो अपने लड़के कि शादी बिना एक पैसे के लेन देन के कर रहे है ,बस लड़की एक जोड़ा जो कपडा पहना है उसमे आ जाये , साथ ही उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया था कि वह माँ बाप कि इकलोती बेटी हो जिसे अपने माँ बाप कि सारी अकूत दौलत मिलने वाली हो } यह विचित्र रिवाज़ जिसे दहेज़ प्रथा कहते हैं निश्चित ही लड़की पर भारी है पर गलत माँ बाप ज्यादा है जो उसका वाजिब हक का कुछ हिस्सा भी इतना मन मसोस के देते है या फिर लड़के के घर वाले जो जरुरत से जयादा मांग रखकर अपनी बहु के लिए तमाम मानसिक क्लेश पैदा कर देते हैं |

के द्वारा: RaJ RaJ

के द्वारा:

के द्वारा:

रजनी बहिन .....नमस्कार ! मेरे घर वालो को तो मैं ज़हर समान लगता हूँ , लेकिन आज मैं खुद को भी ज़हर समान ही लग रहा हूँ .....इसलिए तुम्हारा मुझको प्यारे भाईसाहब कहना अजीब सा लग रहा है ..... तुम्हारे इस कदम (ब्लाग डिलीट करने ) से मैं तुम से भी खफा हूँ और खुद से भी ...... इसलिये तुमसे नराजगी भी है .... हमारे ब्लाग एक बार प्रकाशित होने के बाद हमारी नहीं बल्कि इस समाज और जागरण कि सम्पति बन जाते है अगर कोई माने तो ...... इसलिए ऐसा कोई भी कदम समझदारी वाला कतई नहीं कहा जायेगा .... और मैं अपनी बहन से तो कभी भी इस तरह कि कोई आशा रखूँगा कि आइन्दा कभी भी वोह संगदिली का सबूत देते हुए इस तरह का कदम उठाएगी ..... ढेर सारी नाराजगी सहित

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

रजनी जी, आपकी कविता, पोस्ट होने के लगभग डेढ़ महीने के बाद, पढ़ रहा हूँ इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ मै इस दौरान ब्लॉग से दूर रहा यही कारण रहा है.............. आपकी कविता ने मुझे असमंजस में डाल दिया, कि प्रतिक्रिया देते समय क्या लिखू, क्योंकि कविता की विधा के अनुसार( कवित्त के दृष्टिकोण से) ये एक अति उत्तम कविता है................ और ये उन तीसरी नस्ल वालो के मार्मिक वेदना को दर्शाती है, जो असहाय हैं.................. किन्तु इन्ही तीसरी नस्ल वालो के बीच में छुपे लुटेरो के विषय में आप क्या कहेंगी.............. शायद आप खुद नहीं जानती होंगी........ कृपया मेरी पोस्ट "हिजड़ों द्वारा बधाई या आतंक..........फैसला आपका" पढने का कष्ट करें........ शायद मेरी असमंजस का कारण मिल जायेगा........... खैर..................... कविता बहुत ही उत्तम है, शब्द संयोजन अति उत्तम.............. बधाई स्वीकारें ! आदित्य www.aditya.jagranjunction.com

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दोष हमारी अपनी मानसिकता का है जिसने हमें इस हद तक स्व-केन्द्रित बना दिया है कि बाहर की दुनिया और अडोस-पड़ोस हमारे लिए कोई मायने ही नहीं रखता रजनी जी सुन्दर सार्थक अभिव्यक्ति हम स्वार्थ से उबर अगर ये देख पायें की हमारे किये जा रहे कर्म का असर क्या हो रहा है कल क्या होगा तब तो कोई बात ही नहीं हमारा समाज बिगड़े -हमें तो मतलब है आज अपने जेब भरने और अपने महल खड़े करने से -इतना अधिक कम भर लें की पकडे भी जाएँ तो बेटे बेटी खाएं -हम चाहे कैद में ही रहें पैसा रहेगा तो जमानत भी हो ही जायेगा रजनी जी इसिलए तो हम हीरे की उम्र आप से बोले बाधा दीजियेगा .अच्छी क्लाश लगने से नंबर भी अधिक मिलता है न -ॐ शांतिः भ्रमर५

के द्वारा: shuklabhramar5 shuklabhramar5

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पाश्चात्य जगत के लिए एक अविश्वसनीय तथ्य रहा है कि भारतीय ज्योतिष एवं खगोल शास्त्रियों को पृथ्वी की धुरी का स्वयं एक और छोटे वृत्त में (precession) में घूमना (यह थोड़ा और भी जटिल है और वह भी हमारे विद्वानों को पता था...) पता था. वह लोग इस तथ्य को झुठलाने का प्रयास अनवरत करते रहे हैं...तथापि अब यह बात संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों के आधार पर विद्वत जगत में स्वीकारी जाने लगी है...इस गति को गड़ना में लेने के कारण भारतीय ज्योतिष पाश्चात्य ज्योतिष से बहुत आगे निकल जाता है...और फिर आगे की गड़नाएं अपने परिष्कृत सिद्धांतों के कारण हमारे इस शास्त्र को सिरमौर बना देती हैं... ....................................................................... रजनी जी इस विषय पर आपके द्वारा लेख लिखे जाने पर आप बधाई की पात्र हैं....भारतीय ज्योतिष को वेदांगों में दृष्टि माना गया है...यह शास्त्र जीवन पर एक प्रकाश डालता है जिसके आधार पर मनुष्य अपने कर्म स्वातंत्र्य का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं आनंददायक बना सकता है ...

के द्वारा: rajeevdubey rajeevdubey

आदरणीय रजनी जी अगर विशुद्ध वैज्ञानिक मत को देखा जय तो ब्रह्माण्ड का हर पिंड चालायमान है ,,,,,अतः किसी भी बिंदु को अचल मानकर विश्लेषण सही है ,,,,,,,,,चुकि भविष्यवानियाँ पृथ्वी के लिए होती है अतः पृथ्वी को अचर मन लेने ज्यादा सुलभ है बनिस्पत सूर्य के जहाँ त्रुटी की ज्यादा गुंजाइश है ,,,,,,,,,,पुनः,भारतीय ज्योतिष सटीक गणनाएं करता है | उदाहरंस्वरूप, आद्रा नक्षत्र के आने पर हीं बारिश शुरू होती है | इस मामले में मौसम विभाग भी गलत हो जाता है किन्तु भारतीय ज्योतिष शाश्त्र नहीं | बसंत पंचमी पर बारिश जरूर होती है | मकर संक्रांति पर मौसम का बदलाव भी होता है ..........अनेक उदहारण है | भारतीय ज्योतिष हीं श्रेष्ठ है | अच्छे आलेख पर बधाई |

के द्वारा: baijnathpandey baijnathpandey

राजीव जी ,आपकी प्रतिक्रिया देखकर ख़ुशी हुई. मुझे लगता है की संचित एवं प्रारब्ध कर्म के बारे में और लिखना चाहिए था..अभी मैंने add करने की कोशिश की है लेकिन transliteration सर्वर कम नहीं कर रहा.....संचित कर्म बीज के रूप में hota है na की फल के रूप में. प्रारब्ध कर्म, फल के रूप में मिलते हैं...यह उसी तरह है जैसे संचित कर्म के बीज से अभी अंकुर निकले है जिसके फल का स्वाद भविष्य में मिलेगा और प्रारब्ध कर्मों के फल हमें वर्तमान में मिलते है जिसके बीज पहले के कर्मों द्वारा बोये जा चुके है...संचित की अगली कड़ी प्रारब्ध कर्म ही है , मै इस सम्बन्ध में आपके विचार जानना चाहूंगी. सही कहा आपने ,ग्रंथों का अध्ययन तो मै कर रही हूँ..अभी मैंने ज्योतिष विशारद की परीक्षाएं दी है ..लेकिन ज्योतिष शाश्त्र जैसे ज्ञान के महासागर के समक्ष ४-५ सालों का अध्ययन चुल्लू भर पानी के सामान ही है. मेरे ७२ वर्षीय गुरूजी भी खुद को इस शाश्त्र का विद्यार्थी ही मानते हैं.

के द्वारा:

रजनी जी, आप इस विषय पर लेख लिखने का कार्य कर रही हैं यह देख प्रसन्नता हुई. परन्तु, आपकी परिभाषाएं शास्त्र सम्मत नहीं हैं. विशेषतया कृपया संचित एवं प्रारब्ध पर पुनः अध्ययन करें .. भारतीय परम्परा में ज्योतिष वेदांग है और अध्यात्म से उसका गहन सम्बन्ध है . किसी योग्य गुरु से परम्परानुसार दीक्षा के पश्चात ही ज्योतिष पर अधिकार आता है. इसके लिए संस्कृत व्याकरण का समुचित ज्ञान आवश्यक है . ग्रंथों को मूल संकृत में पढ़ने पर ही विशिष्ट अर्थ स्पष्ट होते हैं, अधिकतर लोग ऐसा नहीं कर अनुवादित सामग्री पढ़ते हैं, उम्मीद है आप मूल ग्रंथों का अध्ययन कर रही होंगी . आपको अपने प्रयासों में सफलता की प्राप्ति हो , ऐसी शुभेक्षा ..

के द्वारा:

के द्वारा: rajnithakur rajnithakur

  प्राय: हर देश-समाज, सभ्‍यता-संस्‍कृति और धर्म धाराओं में विभिन्‍न रूपों में प्रचीन काल से ज्‍योतिष  है, इसी से से इसका महत्‍व समझा जा सकता है। मैं ज्‍योतिष जानने का दावा करने कई लोगों , इनमें दो एक तो राष्‍टी्य स्‍तर के प्रसिद्धि वाले हैं, से मिला हूं। ऐसा कोई नहीं लगा जिसे मैं इस रूप में स्‍वीकार कर पाता। इसे जानने वाले कहते हैं कि ज्‍योतिष एक विज्ञान है। इस दृष्टि से कह सकते हैं कि प्रकृति के अबूझ रहस्‍यों को जानने की जैसी विज्ञान की गति है वैसी ही ज्‍योतिष की है। विज्ञान आज तक प्रकृति के किसी रहस्‍य से अंतिम रूप से पर्दा उठाने में समर्थ नहीं हो पाया है। इसके बावजूद उसेकी उपयोगिता है।  ज्‍योतिष मनो विज्ञान, अंर्तदृष्टि, intution, probability-संभावनावाद, आदि का मिश्रित खेल-इल्‍म कहा जा सकता है। एक कहावत है- मुनि वशिष्‍ठ से पंडित ज्ञानी, सोधि के लगन धरी  ,सीता हरन,मरन दशरथ को वन में विपति परी। सर्वश्रेष्‍ठ ज्ञानियों-ज्‍योतिषियों द्वारा विवाह का शुभ मुहुर्त नि‍कालने के बाद भी सीता-राम के जीवन में क्‍या हुआ ?

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के द्वारा: अंशुमाली रस्तोगी अंशुमाली रस्तोगी

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रजनीजी मुझे एक कहानी यद् आ रही है. कहानी ऐसा था की तिन पीढियां बाज़ार में घूम रहें हैं . पिता,पुत्र और स्वयं तथा साथ में पत्नी भी है. पुत्र: पापा ये क्या है? पिता: बेटा ये स्मारक है. पुत्र: किसका स्मारक है? पिता: गांधीजी का स्मारक है. पुत्र: गांधीजी कौन हैं? पिता: गाँधीजी राष्ट्रपिता हैं. पुत्र:.................................... पिता:............................. पुत्र:............................... पिता:................................ दूसरा सीन दादाजी: बेटा मेरी नज़र कमजोर हो गई है , जरा बताना ये सामने काया दिख रहा है. पिता या (दादाजी के पुत्र): पिताजी ये स्मारक है. दादाजी: किसका स्मारक है? पिता या (दादाजी के पुत्र): किसीका स्मारक है तो अप को क्या. चुप चाप नहीं चल सकते.राम राम कीजिये बेकार समय क्यों बर्बाद करते हैं. और दादाजी चुप हो जातें हैं.

के द्वारा:

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के द्वारा: rajnithakur rajnithakur

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के द्वारा: priyasingh priyasingh

             प्रिय रजनी ठाकुर जी,मेरी बात को अन्यथा न लेना,क्योंकि व्यंगात्मक कविता में ज़रूरी नहीं वास्तविक तथ्य दिए जाएँ........पर आपकी कविता में मुझे जाने क्यों ? पूर्णत: में आंशिक त्रुटि को चिन्हित कर दिया.....पर मुझे लगा आप यदि थोड़ी भी तथ्यपरक परिवेश प्रस्तुत कर देती,तो ये कविता कुछ ज्यादा ही प्रभावकारी हो सकती थी.आपमें असीम संभावनाएं दिखाई देती हैं,सो कुछ सुझाव देने की इच्छा हुई,क्योंकि कभी-कभी बहुत अच्छी वास्तु भी,ज़रा सी त्रुटि के कारण अपना मूल्य स्वरुप खो देती है............... भारत के आंशिक हिस्सों में १९९९ ई. के सामान्य निर्वाचन में और २००२ ई. सामान्य निर्वाचन में सम्पूर्ण भारत में "पहली बार इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग किया गया..............अर्थात ई.वी.एम्. का भारत में पहली वार मतदान कार्य में उपयोग प्रारम्भ हुए .............."मात्र सात से आठ वर्ष का समय" बीता है......................तो आपके कथनानुसार "क्या मात्र आठ वर्ष पूर्व भारतीय ग्राम और शहरों में ज़मीन आसमान का अंतर था ? क्या तब ग्रामीण भारतीय आदिवासी तुल्य जीवन स्तर पर जी रहा था? आठ वर्ष पहले "ग्रामीण और शहरी क्षेत्र के लोगों ने एक साथ ........ इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के दर्शन और मतदान में प्रयोग किया था.......................... तो क्या शहरी लोग अभिमन्यु के तरह टी.एन. शेसन जी से ई.वी.एम्. का तिलिस्मी चक्रव्यूह तोडना जन्म लेने से पूर्व सीख चुके थे,...........और अनपढ़ ग्रामीण आज भी जादुई चिराग की तरह इसका रहस्य समझने से वंचित हैं............एक बात और भारतीय ई.वी.एम्. के विकास और डिजाइन प्रोद्योगिकी के विकास में आधे से अधिक उन तकनीकि विशेषज्ञों का योगदान है,जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से संवंधित हैं. संभवता आप "मुंशी प्रेमचंद की पन्चलेट " से प्रभावित हैं,और उसी युग के ग्रामीण परिद्रश्य की कल्पना को आपने "अपनी कविता का आधार" बना लिया..........पर गाँव अशिक्षित,असभ्य,गंवार,बेवकूफ ,अविकसित,और अल्पज्ञानी लोगों से नहीं......शहरों और महानगरों की जनसँख्या से ज्यादा जागरूक,कुशल,और योग्यतावान लोगो की जन्मस्थली रहा है,और रहेगा..... गुलाम भारत को आज़ाद कराने में योगदान देने वाले "राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर भगत सिंह,चन्द्र शेखर आज़ाद,सरदार पटेल,विरसा-मुंडा,महात्मा ज्योतिवा फुले आदि सभी ग्रामीण जनसँख्या से ही आये थे. स्वतंत्र भारत देश के ०७ से अधिक प्रधानमन्त्री ग्रामीन पृष्ठभूमि से आये,जिनकी प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक तक की शिक्षा सामान्य ग्रामीण विद्यालयों/कालेजों में पूर्ण हुई.............ये हैं- चौधरी चरण सिंह,मोरारजी देसाई,गुलजारी लाल नंदा,एच.डी. देवेगौडा,चन्द्र शेखर,वी.पी. सिंह,लाल बहादुर शास्त्री,नरसिम्हा राव,आदि. स्वतंत्र भारत के अधिकाँश राष्ट्रपति,उपराष्ट्र पति,लोक सभा एवं विधान सभा अध्यक्ष तक ग्रामीण परिवेश में पले और पड़े,और कई ने बाद में भी ग्रामीण जीवन पसंद किया. स्वतंत्रता से पूर्व और स्वतंत्रता के वाद देश की सर्वोच्च प्रशासनिक सेवा "आई.ए.एस./आई.पी.एस./आई.ऍफ़.एस./आर.ए.एस आदि" में आधे से अधिक चयनित प्रतियोगी ग्रामीण पृष्ठभूमि से ही आते हैं........और कुल चयनित प्रतियोगियों का लगभग २०-२५% तक भाग,उन प्रतियोगियों का होता है,जिनकी प्राथमिक से लेकर माध्यमिक /उच्चतर माध्यमिक शिक्षा ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों/कालेजों से प्राप्त की होती है. येही वो जनसँख्या है,जो सम्पूर्ण भारत की जनसँख्या की उदर-पूर्ति के खाद्दांत पैदा करती है,फिर भी खुद भूखी सो जाने को मजबूर हो जाती है कभी-कभी. प्रज्ञा ठाकुर के जीवन और उनके शरीर की नाड़ियों में रक्त दौडाने,उनका ह्रदय स्पंदित करने में "प्रज्ञा के माता-पिता के अलाबा" इसी ग्रामीण जनसँख्या का योगदान होता है.

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सहोदर रजनी ठाकुर सप्रेम स्नेह सहित नमस्कार स्वीकार करें चुनाव/मतदान विषय पर लिखी आपकी हास्य काव्य प्रस्तुति अच्छी है.......पर और भी बेहतर होता,कि विषय को ग्रामीण या शहरी पृष्ठभूमि के परिपेक्ष न रखते हुए,केवल सार्वभौमिक मतदान को अपना विषय बनातीं.............रही बात ग्रामीण परिद्रश्य,सामाजिक स्तर,शिक्षा और मानसिक बुद्धिलब्धि का स्तर,तो शायद आप व्यक्तिगत पूर्वाग्रह से प्रेरित "दीन-हीन अशिक्षित ग्रामीण परिवेश" अतिशयोक्तिपूर्ण है,.......और आपकी नकारात्मक सोच को प्रतिविम्वित करता प्रतीत होता है. गाँव के संवंध में आपकी सोच का स्तर बास्तविकता से परे तथ्यहीन और आधारहीन है.......गाँव का जो चित्र आपने अपनी कविता में खींचा है.वो केवल किस्से-कहानियों और कुछ फिल्मों तक ही सीमित है,और उसे भी प्रस्तुत करने वाले वो लोग हैं,जिन्होनें कभी गाँव को करीव से न तो देखा है,और न समझा है,घर या दफ्तर के कोने में वैठकर वास्तविकता नहीं बतायी जा सकती ....वास्तविकता उसके ठीक विपरीत और कहीं अच्छी है. गाँव कभी भी शहरों से शिक्षा,तकनिकी कौशल,मानसिक योगता,ज्ञान और सामाजिक सोच में कम नहीं है,वल्कि शहरी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा,जोकि आम शहरी समाज से अलग-थलग वंचित वर्ग का है,जो सामान्यता झुग्गी-झोंपड़ियों और स्ट्रीट पर रहने को अभिशप्त है,वो वर्ग एक हद तक आपकी कसौटी पर खरा उतर सकता है.

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